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सफाई (लघुकथा) : डॉo विजय शंकर

दावत जोरदार रही , सब ने छक के खाया, खाना था ही इतना बढ़िया , तिस पर बिठा कर पत्तल पर प्रेम से परोस-परोस कर खिलाया गया था। अब कहाँ होतीं हैं ऐसी दावतें। देर रात तक नौकरों ने सारे पत्तल इकठ्ठा करके पास तिराहे के कोने पर, जहां लोग कूड़ा फेंकते थे , फेंक दिये। लोग रात देर तक टहल टहल कर बतियाते रहे , दावत की तारीफ करते रहे। सब कुछ अच्छा था पर किसी एक-दो को अच्छा नहीं लगा। किसी ने सुबह-सुबह इधर-उधर दो एक फोन कर दिये । साढ़े दस तक एक बाबू साहब एक डायरी लेकर आ गए। उन्हें बुलवाया , कहा , अच्छी दावत की , पत्तलों की ओर इशारा करके बोले , ये हमारे लिये छोड़ दिया। पत्तलों का ढेर लगा था, प्लास्टिक के गिलास , प्लास्टिक बीनने वाले बीन ले गए थे। उन्होंने अपनी बात रखी , अब कूड़ा तो सब लोग यहीं डालते हैं। बाबू जी लगातार डायरी भर रहे थे , बोले , कूड़ा डालते हैं पर इतना ढेर सारा नहीं। सफाई की जिम्मेदारी तो हमारी है , न।


उन्होंने जेब से चुपचाप एक हरा नोट निकला , बढ़ा दिया। बाबू जी ने डायरी में लिखा काट दिया , बोले चिंता मत करियेगा , हम कौन सा आ रहे थे , आप ही के पड़ोसी लोग हैं फोन कर कर.…… , जाने दीजिये , किसी को क्या कहना , सफाई तो हो ही जाएगी .

 
वो धीरे-धीरे अपने घर में घुस गए , बाबू जी अपने औफिस लौट गए , पड़ोस के कुछ लोग मुस्कुराये , खुश हुये ,सोच रहे थे, सही काम किया न, सफाई तो होनी चाहिए न ? सब अपनी अपनी जगह खुश थे , सफाई की बात हो गयी।


थोड़ी देर बाद अड़ोस -पड़ोस के जानवर आने लगे , सारे पत्तल चाट -चाट कर जूठन साफ़ कर दी। दो चार दिन में सारे पत्तल सूख गए , कुछ उड़ गए , कुछ इनके- उनकें वाहनों के पहियों में लग -लग के शहर में दूर दूर तक फ़ैल गए। हफ्ता लगा , सब साफ़ हो गया अपने आप। सफाई हो चुकी थी , लोग सब भूल चुके थे।

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Saurabh Pandey on October 31, 2014 at 12:53am

अभिव्यक्ति व्यंजनामूलक है आदरणीय डॉ. विजय शंकरजी..

प्रस्तुति के लिए सादर बधाइयाँ, आदरणीय..

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 29, 2014 at 10:32pm

आपकी सद्भावनाओं के लिए धन्यवाद आदरणीय विजय निकोर जी, सादर।  

Comment by vijay nikore on October 29, 2014 at 3:44pm

संदेश देती इस अच्छी रचना के लिए बधाई।

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 28, 2014 at 9:43pm

रचना आपको अच्छी लगी, ख़ुशी हुयी।  बधाई के लिए  बहुत बहुत  धन्यवाद प्रिय जीतेन्द्र जी .

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 27, 2014 at 10:26am

खोखली गंदगी की बहुत सुन्दरता और कटाक्ष  से सफाई करती हुई रचना. हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीय डा.विजय जी

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 27, 2014 at 1:19am

आदरणीय सोमेश कुमार  जी , आपने कहानी  को स्वीकार कर व्यंग  को सराहा है , सच्चाई यही है सब कुछ एक व्यंग बन कर ही रह गया है। बहुत बहुत धन्यवाद। 

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 27, 2014 at 1:12am

आदरणीय डॉo गोपाल नारायण जी , आपने कहानी के सारे पहलुओं को स्वीकार कर व्यंग  को सराहा है , सच्चाई यही है, सब कुछ एक व्यंग बन कर ही रह गया है ,  हर काम अपनी जगह पर पूरा होता है , फिर भी कोई परिणाम नहीं निकलता है , सब कुछ यथावत ही रहता है।  बहुत बहुत धन्यवाद।  जय हो।  

Comment by somesh kumar on October 26, 2014 at 9:16pm

सफ़ाई की प्रकृति या प्रकृति द्वारा सफ़ाई |बढियाँ कथा 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 26, 2014 at 8:27pm

विजय सर !

उम्दा कहानी i व्यंग्य करती, सन्देश देती, व्यवस्था की पोल खोलती i भीतर तक गुदगुदाती i जय हो i

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