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चुप होना चाहता हूँ ....

चुप होना चाहता हूँ ....

नहीं नहीं
बहुत हुआ
अब मैं चुप रहना चाहता हूँ
अंधेरों सा खामोश रहना चाहता हूँ
अब मेरे पास
न तो विचार हैं
न किसी भी विचार को
अभिव्यक्त करने के लिए शब्द

पता नहीं

क्यों मैं चुप नहीं रह पाता
बावजूद ये जानते हुए भी
कि मेरे बोलने से कुछ नहीं बदलने वाला
मैं निरंतर बोले जा रहा हूँ
न जाने किसे और क्या क्या

मैं नहीं जानता
मेरा इस तरह से लगातार बोलना
किस हद तक ठीक है या गलत
हाँ मगर ये जानता हूँ
इस भौतिक संसार में
गूँगी किताबों और शब्दों की भीड़ में घिरा हुआ
चुप रहने की कोशिश में
लगातार बोले जा रहा हूँ


मेरे सारे प्रयत्न
चुप रहने की कोशिश में
निष्फल होते जा रहे हैं
मैं अपने विचारों की ज़मीन पर
अंकुरित होते शब्दों को
विराम देना चाहता हूँ
मैं अंधेरी आकृतियों में लीन होना चाहता हूँ
अभिव्यक्ति की वीचियों से
दूर होना चाहता हूँ
सच दोस्तों
अब मैं चुप होना चाहता हूँ , चुप होना चाहता हूँ ....

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 557

Comment

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Comment by Sushil Sarna on June 1, 2019 at 7:47pm

आदरणीय  narendrasinh chauhanजी सृजन पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का दिल से आभार। 

Comment by Sushil Sarna on June 1, 2019 at 7:47pm

आदरणीय  गिरिराज भंडारीजी सृजन पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का दिल से आभार। सर आपका कथन सही लग रहा है , भावावेश में लिख गया। मेने संशोधन कर दिया है।
इस अमूल्य सुझाव के लिए दिल से आभार।

Comment by narendrasinh chauhan on June 1, 2019 at 6:13pm

बहुत खूब  आदरनीय , कविता के लिए आपको हार्दिक बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 1, 2019 at 1:04pm

अच्छी कविता लगी आदरणीय .. बधाई

अब मेरे पास
न तो विचार हैं
न उन विचारों को
अभिव्यक्त करने के लिए शब्द   ---  दूसरी  पंक्ति मे आप कह रहे हैं कि ..मेरे पास विचार नहीं है .. फिर नीचे आप कह रहे हैं .. विचारों को अभिव्यक्ति के लिए शब्द नहीं है .. सोचियेगा

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