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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९०

२१२२ ११२२ ११२२ ११२/२२

अस्ल के बाद तो जीना है निशानी के लिए
ज़िंदगी लंबी है दो रोज़ा जवानी के लिए //१

यूँ ज़बां ख़ूब है ये तुर्रा बयानी के लिए
उर्दू मशहूर हुई शीरीं ज़बानी के लिए //२

लोग क्यों दीनी तशद्दुद के लिए मरते हैं
जबकि जीना था उन्हें जज़्बे रुहानी के लिए //३

नफ़्स के झगड़े हैं ने'मत से भरी दुन्या में
चंद रोटी के लिए तो, कभी पानी के लिए //४

क्यों रक़ीबों से मुरव्वत की तवक्को रखना
कुफ़्र लाज़िम हैं जिन्हें रेशा दवानी के लिए //५

इश्क़ आसाँ नहीं था हुस्ने गराँ से करना
जीते जी मरना पड़ा शौक़े निहानी के लिए //६

दिल तो यूँ है कि जैसे प्यास का मारा पंछी
छत से उड़ जाए किसी झील के पानी के लिए //७

हमने इक तीर से माशूक़ को बिस्मिल है किया
और इक तीर बचा रक्खा है सानी के लिए //८

बाद इस ज़िंदगी के हो न मलालत हमको
रूह की जाए' अबस आलमे फ़ानी के लिए //९

लोग क्या ‘राज़’ की समझेंगे शहादत यारो
उसने किरदार को मारा है कहानी के लिए //१०  

~राज़ नवादवी

“मौलिक एवं अप्रकाशित”

अबस- व्यर्थ; रेशा दवानी- षड्यंत्र

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Comment by Md. Anis arman on January 7, 2019 at 10:26am

बहुत खूब राज़ साहब सुबह सुबह आपकी ग़ज़ल पढ़ा दिल बाग़ बाग़  हो गया है ग़ज़ल को क्या सजाया है आपने मुबारकबाद क़ुबूल कीजिये l

Comment by नाथ सोनांचली on January 7, 2019 at 9:21am

लोग क्या ‘राज़’ की समझेंगे शहादत यारो
उसने किरदार को मारा है कहानी के लिए //

कितनी खूबसूरत मकता कही आपने,, वाह वाह

आद0 राज नवादवी जी सादर अभिवादन। पुनः एक बेहतरीन ग़ज़ल पटल पर रखी आपने। बधाई स्वीकार कीजिये। सादर

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