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ऐ अब्र जरा आग बुझाने के लिए आ

221-1221-1221-122.


तपती जमीं है आज तू छाने के लिए आ ।
ऐ अब्र जरा आग बुझाने के लिए आ ।।

यूँ ही न गुजर जाए कहीं तिश्नगी का दौर ।
तू मैकदे में पीने पिलाने के लिए आ ।।

ये जिंदगी तो हम ने गुज़ारी है खालिस में ।
कुछ दर्द मेरा अब तो बटाने के लिए आ ।।

जब नाज़ से आया है कोई बज़्म में तेरी ।
क़ातिल तू हुनर अपना दिखाने के लिए आ।।

शर्मो हया है तुझ में तो वादा निभा के देख ।
मेरी वफ़ा का कर्ज चुकाने के लिए आ ।।

टूटे न मुहब्बत का भरम इस जहाँ से अब ।
मेरे लिए तू छोड़ , ज़माने के लिए आ ।।

तन्हाइयों में चैन मयस्सर तुझे है कब।
अम्नो सुकूँ से रात बिताने के लिए आ ।।

खो जाए उमीदें न कहीं वस्ल की मेरी ।
सोया है मेरा ख्वाब जगाने के लिए आ ।।

चर्चा में तेरी खूब रही सख़्त हुकूमत ।
अब हुक्म मेरे दिल पे चलाने के लिए आ ।।

इल्जाम लगा बैठे गुनाहों के तरफ़दार ।
गर हो सके तू नाज़ उठाने के लिए आ ।।

आती नहीं है नींद तस्व्वुर की जमीं पर ।
ऐ हुस्न मेरा होश मिटाने के लिए आ ।।

-नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अप्रकाशित 

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Comment by Naveen Mani Tripathi on October 13, 2018 at 6:15pm

आ0 बृजेश कुमार ब्रज जी तस्व्वुर की जमी पर 

टाइपो पर ध्यान दिलाने के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 13, 2018 at 6:14pm

आ वी ऍम  वृष्टि जी ग़ज़ल तक आने के लिए सादर आभार और नमन । 

Comment by V.M.''vrishty'' on October 13, 2018 at 2:54pm
आदरणीय नवीन जी, प्रणाम! आपकी रचना में विषय और भाव गज़ब के होते है और हर शेर मन को लुभा लेता है। बहुत बहुत बधाई !
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 13, 2018 at 7:45am

वाह आदरणीय त्रिपाठी जी एक और खूबसूरत ग़ज़ल..आखरी शेर के उला को लेकर संशय है "तसव्वुर के जमीं पर" या तसव्वुर की जमीं पर"..सादर

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 12, 2018 at 6:17pm

आ0 कबीर सर सादर नमन ,

आपकी बात से सहमत हूँ सर ग़ज़ल वाकई जल्दबाजी में ही लिखी गयी है । त्रुटियां सम्भावित थीं सो आपकी निगाह से बचना भी असम्भव था । एक मिसरा तो स्पष्ट तौर से बे बह्र था । 

उसे मैंने ठीक करने का प्रयास भी किया है जो निम्नवत है 

     

ये जिंदगी तो हम ने गुज़ारी है खालिस में ।

जब नाज़ से आया( है ) यहां है टाइप में छूट गया ।

नीचे के दो शेर में एक मात्रा इजाफ़त के तौर पर मिसरे के अंत बढ़ाया गया है । मैंने कहीं पढ़ा था कि यदि मिसरे के अंत में 2 मात्रा है तो 1 मात्रा बढ़ा सकते हैं । इसी ज्ञान के आधार पर एक मात्रा मिसरे के अंत में अधिक लिया गया है ।

    यदि इस बह्र में एक मात्रा बढाना वर्जित ही तो बताने की कृपा करें । 

सादर नमन । 

शर्मो हया है तुझ में तो वादा निभा के देख 

22  1  1 2  2  1  1  22   1  1  2  2 (1)

यूँ ही न गुजर  जाये कहीं तिश्नगी का दौर 

2  2 1  12    21   12   211  2    2 (1)

Comment by Samar kabeer on October 12, 2018 at 2:48pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल अभी समय चाहती है,जल्दबाज़ी में कही गई है ।

'यूँ ही न गुजर जाए कहीं तिश्नगी का दौर'

'इतनी खलिश के साथ गुजारी है जिंदगी'

'जब नाज़ से आया कोई बज़्म में तेरी'

'शर्मो हया है तुझ में तो वादा निभा के देख'

इन मिसरों की बह्र चेक करें ।

Comment by narendrasinh chauhan on October 12, 2018 at 2:26pm

शानदार रचना 

Comment by TEJ VEER SINGH on October 12, 2018 at 10:53am

हार्दिक बधाइ आदरणीय नवीन मणि जी।लाज़वाब गज़ल।

यूँ ही न गुजर जाए कहीं तिश्नगी का दौर ।
तू मैकदे में पीने पिलाने के लिए आ ।।

इतनी खलिश के साथ गुजारी है जिंदगी ।
कुछ दर्द मेरा अब तो बटाने के लिए आ ।।

कृपया ध्यान दे...

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