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अभी तो यहाँ कुछ हुआ ही नहीं है ।
वो नादां उसे तज्रिबा ही नही है ।।1

उसे ही मिलेगी सजा हिज्र की अब ।
मुहब्बत में जिसकी ख़ता ही नहीं है ।।2

मिलेगा कहाँ से हमें कोई धोका ।
हमें आप का आसरा ही नहीं है ।।3

अगर आ गए हैं तो कुछ देर रुकिए ।
अभी तो मेरा दिल भरा ही नहीं है ।।4

है बेचैन कितना वो आशिक तुम्हारा ।
कहा किसने जादू चला ही नहीं है ।।5

जिधर जा रही वो उधर जा रहे हम ।
हमें जिंदगी से गिला ही नहीं है ।।6

बताने लगा है ये नफरत का लहज़ा ।
मेरा खत वो अबतक पढ़ा ही नहीं है ।।7

भरोसा न कीजै यहाँ पर किसी का ।
सियासत में कोई सगा ही नहीं है ।।8

यहाँ हाले दिल पूछते हैं वो जैसे ।
कि उनको मेरा गम पता ही नहीं है ।।9

करूँ अर्ज कैसे ज़माना है क़ातिल ।
चमन में कहीं देवता ही नहीं है ।।10

लगी आग बेशक जली दिल की बस्ती ।
धुंआ देखिये कुछ उठा ही नहीं है ।।11

नवीन मणि त्रिपाठी 

मौलिक अप्रकाशित 

Views: 623

Comment

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Comment by Naveen Mani Tripathi on October 7, 2018 at 11:41pm

आ0 नरेंद्र सिंह चौहान साहब हार्दिक आभार ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 7, 2018 at 11:41pm

आ0 मुसाफ़िर साहब तहे दिल से शुक्रिया ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 7, 2018 at 11:40pm

आ0 तेजवीर सिंह साहब तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रियः ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on October 7, 2018 at 11:39pm

आ0 कबीर सर सादर  नमन । 

सर अवश्य प्रयास करूंगा । ईश्वर आपका स्नेह बनाएं रखें ।

Comment by Samar kabeer on October 7, 2018 at 7:14pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

मतले का सानी मिसरा और बहतर करने का प्रयास करें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on October 7, 2018 at 10:29am

हार्दिक बधाई आदरणीय नवीन जी। बेहतरीन गज़ल।

भरोसा न कीजै यहाँ पर किसी का ।
सियासत में कोई सगा ही नहीं है ।।8

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 7, 2018 at 5:32am

आ. भाई नवीन जी, अच्छी गजल हुयी है । हार्दिक बधायी ।

Comment by narendrasinh chauhan on October 6, 2018 at 10:36pm

खुब उम्दा रचना..

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