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भले थोड़ी रुकावट आज है

पतवार के आगे

किनारा भी मिलेगा कल,

हमें मँझधार के आगे.

 

अमन की क्यारियाँ सींचो,

मुहब्बत को महकने दो.

हृदय में आज अपने तुम,

हमारा दिल धड़कने दो.

 

न अपने हाथ फैलाओ,

कभी सरकार के आगे.

 

न पकड़ो हाथ में चाक़ू,

बनाओ मित्र कुछ अपने.

हृदय का पृष्ठ कोरा है,

उकेरो कुछ नये सपने.

 

नहीं तलवार लगती कुछ,

कलम की धार के आगे

 

न बम होंगे न बन्दूकें,

न पत्थर बाजियाँ होंगी.

गुलाबों और केसर से,

सजी फिर घाटियाँ होंगी.

 

घृणा के पैर टिक पायें,

न संभव प्यार के आगे.

 "मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 18, 2018 at 8:48am

हृदय से आभार आदरणीय Shyam Narain Verma जी आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 18, 2018 at 8:47am

हृदय से आभार आदरणीया बबिता गुप्ता जी आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 18, 2018 at 8:47am

हृदय से आभार आदरणीय नादिर खान जी आपका 

Comment by नादिर ख़ान on August 15, 2018 at 7:48pm

अमन की क्यारियाँ सींचो,

मुहब्बत को महकने दो.

हृदय में आज अपने तुम,

हमारा दिल धड़कने दो....खूबसूरत भाव लिए उत्तम रचना के लिए बधाई आदरणीय बसंत कुमार जी ...

Comment by babitagupta on August 15, 2018 at 3:48pm

शुरू की चार पंक्तियाँ बहुत ही सुंदर,बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सरजी।

Comment by Shyam Narain Verma on August 14, 2018 at 4:49pm

सुंदर गीत के लिए .दिल से बधाई  सादर

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 14, 2018 at 4:03pm

आदरणीया Neelam Upadhyaya जी , आपका हृदय से आभार 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 14, 2018 at 4:03pm

आपकी उपस्थिति को सादर नमन आदरणीय Samar kabeer जी 

Comment by Neelam Upadhyaya on August 14, 2018 at 3:25pm

आदरणीय बसंत कुमार जी,  बहुत ही सूंदर रचना हुई है ।   प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें।

Comment by Samar kabeer on August 13, 2018 at 3:59pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,बहुत सुंदर गीत हुआ है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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