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हाशिये पर आपकी दस्तार है कुछ कीजिये (ग़ज़ल राज)

बेसबब बेसाख़्ता रफ़्तार है कुछ कीजिये 
लड़खड़ाती जिंदगी हर बार है कुछ कीजिये 

उठ रही हैं उँगलियाँ सब आपके घर की तरफ़ 
हाशिये पर आपकी दस्तार है कुछ कीजिये 

वक्त आते ही डसेगा एक दिन वो आपको 
आस्तीं में पल रहा मक्कार है कुछ कीजिये 

आपके घर की तरफ़ से आ रहे पत्थर सभी 
आपके घर में छुपा गद्दार है कुछ कीजिये 

इस तरह तो मुफ़्लिसी दम तोड़ देगी भूख से 
आसमां को छू रहा बाज़ार है कुछ कीजिये

हैं मुखालिफ़ कुछ हवायें हो रही कमजोर छत 
डगमगाती आपकी सरकार है कुछ कीजिये 

काम की मसरूफ़यत से घूमने जाते नहीं 
आज बच्चे कह रहे इतवार है कुछ कीजिये

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on July 16, 2018 at 10:07am

वाह शानदार गजल हुई है , बधाई आपको 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 13, 2018 at 5:58pm

क्या कहने आदरणीया बहुत ही शानदार ग़ज़ल कही है..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 13, 2018 at 5:35pm

आद० गुरप्रीत जी ग़ज़ल पर सुख़न नवाज़ी का तहे दिल से शुक्रिया .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 13, 2018 at 5:34pm

आद० नीलम जी ग़ज़ल पर सुख़न नवाज़ी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by Gurpreet Singh jammu on July 13, 2018 at 4:16pm

आदरणीया राजेश जी ,, वाह , बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल ,, सभी अशआर बढ़िया ,, मकता ख़ास तौर पर बहुत पसंद आया

Comment by Neelam Upadhyaya on July 13, 2018 at 3:50pm

 आदरणीया राजेशकुमारी जी, नमस्कार ।  बढ़िया  ग़ज़ल की पेशकश के लिए हार्दिक बधाई ।    


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 12, 2018 at 6:33pm

आद० लक्ष्मण धामी भैया आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका बहुत बहुत शुक्रिया 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 12, 2018 at 6:33pm

आद० श्याम नारायण जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 12, 2018 at 6:32pm

आद० मोहम्मद आरिफ जी आपका दिल से बहुत बहुत शुक्रिया 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 12, 2018 at 6:31pm

आद० अजय कुमार जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया |

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