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आग़ोश -ए-जवानी ...

आग़ोश -ए-जवानी ...


न, न
रहने दो
कुछ न कहो
ख़ामोश रहो
मैं
तुम्हारी ख़ामोशी में
तुम्हें सुन सकता हूँ
तुम
एक अथाह और
शांत सागर हो
मैं
चाहतों का सफ़ीना हूँ
इसे अल्फाज़ की मौजों पर
रवानी दे दो
मेरे वज़ूद को
आग़ोश -ए-जवानी दे दो

सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on July 9, 2018 at 2:32pm

आदरणीया नीलम उपाध्याय जी सृजन को मान देने का दिल से आभार।

Comment by Neelam Upadhyaya on July 9, 2018 at 2:00pm

आदरणीय  सुशील  सरना जी, नमस्कार ।  अच्छी रचना की प्रस्तुति के लिए बधाई । 

Comment by Sushil Sarna on July 6, 2018 at 8:23pm

आदरणीय तेजवीर सिंह जी सृजन को मान देने का दिल से आभार। टंकण त्रुटियों को एडिट कर दिया है। नज़र से चूक हो गयी। बहरहाल आपके स्नेह का शुक्रिया।

Comment by Sushil Sarna on July 6, 2018 at 8:23pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब ... सृजन पर आपकी सुझावात्मक टिप्पणी का दिल से शुक्रिया। सर दो स्थानों पर टंकण त्रुटि थी उसे एडिट कर दिया है और अलफ़ाज़ भूला नहीं हूँ सर बस गलती से हो गया .. भविष्य में ध्यान रहेगा। पुनः आपका हार्दिक आभार।

Comment by TEJ VEER SINGH on July 6, 2018 at 7:59pm

हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना जी।अच्छी प्रस्तुति। लेकिन समर क़बीर साहब ने जो प्रश्न किया है, उस पर गौर कीजिये।मेरे विचार से तो रहने दो ही होना चाहिये।

Comment by Samar kabeer on July 6, 2018 at 6:10pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,कम शब्दों में उम्दा कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'रहने तो' या "रहने दो"?

'चाहतों को सफ़ीना हूँ'--"चाहतों का सफ़ीना हूँ"

'इसे अल्फ़ाज़ों की मौजों पर'--"इसे अल्फ़ाज़ की मौजों पर" ।

पहले भी बता चुका हूँ कि 'लफ़्ज़' का बहुवचन "अल्फ़ाज़" होता है,आप इतनी जल्दी भूल गए?

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