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विचार-मंथन के सागर में (अतुकान्त कविता)

"लोकतंत्र ख़तरे में है!
कहां
इस राष्ट्र में
या
उस मुल्क में!
या
उन सभी देशों में
जहां वह किसी तरह है!
या जो कि
कठपुतली बन गया है
तथाकथित विकसितों के मायाजाल में,
तकनीकी, वैज्ञानिकी विकास में! या
ब्लैकमेलिंग- व्यवसाय में!
धरातल, स्तंभों से दूर हो कर
खो सा गया है
कहीं आसमान में!
दिवास्वप्नों की आंधियों में,
अजीबोग़रीब अनुसंधानों में!


"इंसानियत ख़तरे में है!
कहां
इस मुल्क में
या
उस राष्ट्र में!
या
उन सभी देशों में
जहां वह किसी तरह है!
या जो कि
कठपुतली बन गयी है
शैतानों के मायाजाल में!
कुसंस्कारों, भ्रष्टाचरणों के विकास में!
धार्मिक-स्तंभों, तहज़ीब से दूर हो कर
बस रो रही है निरंतर
आत्मा संग
कहीं
निर्जीव से मानव-शरीर में!
या
धार्मिक-साहित्यिक किताबों में,
विभिन्न विधाओं में!
ताल्लुक है दोनों का
ज़मीनी हक़ीक़तों में!
दुनियावी हालात में
इंसानियत और लोकतंत्र
के द्वंद्व में!
विचार-मंथन के सागर में!

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by babitagupta on June 10, 2018 at 1:02pm

जीर्ण शीर्ण होती लोकतांत्रिक व्यवस्था से देश के बदतर होते हालात का बहुत ही सटीक शब्दों में द्रश्तिपात करना,लाजबाव रचना के लिए हार्दिक आभार आदरणीय सर जी.

Comment by Rohit Dubey "योद्धा " on June 5, 2018 at 7:49pm

katu satya kaha aapne is kavita ke dwara ! Abhar!

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on May 13, 2018 at 3:10pm

मेरी इस अतुकान्त कविता को यहां चयनित करने के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 26, 2018 at 2:09pm

मेरी इस ब्लॉग पोस्ट पर समय देकर अनुमोदन और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब विजय निकोरे साहिब और जनाब डॉ. छोटे लाल सिंह साहिब।

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on April 26, 2018 at 9:05am
आदरणीय शेख शाहजाद साहब यथार्थ का अद्भुत चित्रण किया आपने दिली मुबारकबाद कुबूल कीजए
Comment by vijay nikore on April 26, 2018 at 2:14am

इस विषय पर लिखना आसान नहीं है, फिर भी आपकी रचना अपने लक्ष्य में सफ़ल हुई है ... चिंतन के लिए बहुत कुछ दे रही है। हार्दिक बधाई भाई शैख़ शहज़ाद उस्मानी साहिब ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 24, 2018 at 2:55am

मेरी इस आकस्मिक सृजन पर समय देकर अनुमोदन और स्नेहिल प्रोत्साहन के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब डॉ.  आशुतोष मिश्रा साहिब, जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब और मुहतरमा नीलम उपाध्याय साहिबा।

Comment by Mohammed Arif on April 23, 2018 at 5:50pm

आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,

                                              लोकतंत्र की दशा और दिशा को लेकर , देश के हालातों को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मौलिक नज़रिये से अतुकांत कविता में झाँकने का बेहतरीन और सफलतम प्रयास । इस प्रयास हेतु बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Neelam Upadhyaya on April 23, 2018 at 10:58am

आदरणीय उस्मानी  जी ।  हमेशा की तरह बहुत ही शानदार रचना की प्रस्तुति।  हार्दिक बधाई

"कुसंस्कारों, भ्रष्टाचरणों के विकास में!
धार्मिक-स्तंभों, तहज़ीब से दूर हो कर
बस रो रही है निरंतर
आत्मा संग
कहीं
निर्जीव से मानव-शरीर में!"

Comment by Dr Ashutosh Mishra on April 23, 2018 at 10:49am

आदरणीय शेख शहजाद उस्मानी जी आपकी शानदार लघुकथाओं की तरह शानदार यह अतुकांत रचना चिंतन के लिए बिबश करती है इस शानदार रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें  सादर 

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