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फितरत नहीं छिपती है - (गजल)- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१ १२२२ २२१ १२२२


नफरत के बबूलों को आँगन में उगाओ मत
पाँवों में स्वयं के अब यूँ शूल चुभाओ मत।१।


ऐसा न हो यारों फिर बन जायें विभीषण वो
यूँ दम्भ में इतना भी अपनों काे सताओ मत।२।


फितरत नहीं छिपती है कैसे भी मुखौटे हों
समझो तो मुखौटे अब चेहरों पे लगाओ मत।३।


माना कि तमस देता तकलीफ बहुत लेकिन
घर को ही जला डाले वो दीप जलाओ मत।४।


ढकने को कमी अपनी आजाद बयानों पर
फतवों के मेरे  हाकिम  पैबंद  लगाओ मत।५।


ये वक्त तमाचा  झट जड़  देगा तुम्हारे भी
हालत पे किसी की तुम गाल बजाओ मत।६।


टूटेगा तो  पाँवों में  गिरकर  ये  चुभन देगा
शीशे को तड़ी में यूँ पत्थर तो दिखाओ मत।७।


मालूम नहीं शायद तन भी है  महज मिट्टी
कहते हैं घरौंदा वो मिट्टी का सजाओ मत।८)।


मौलिक अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 4, 2018 at 5:58pm

आ. भाई सुरेंद्र जी, आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 4, 2018 at 5:58pm

आ. भाई ब्रजेश जी , उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 4, 2018 at 5:56pm

आ. भाई अफ्रोज जी, गजल की प्रशंसा के लिए आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 4, 2018 at 5:54pm

आ. भाई तस्दीक अहमद जी, प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 4, 2018 at 5:52pm

आ. भाई राम अवध जी, उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 4, 2018 at 5:49pm

आ. भाई आरिफ जी, इस स्नेह के लिए आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 4, 2018 at 5:46pm

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । बेशकीमती सलाह के लिए आभार ।

Comment by नाथ सोनांचली on February 3, 2018 at 12:49pm

आद0 लक्ष्मण धामी जी सादर अभिवादन। बढिया ग़ज़ल कही आपने, आद0 समर साहब के इस्लाह से और बढिया जो गया है। बहुत वहुत बधाई आपको

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 2, 2018 at 9:54pm

बहुतखूब बहुतखूब ग़ज़ल हुई आदरणीय...सादर

Comment by Afroz 'sahr' on February 2, 2018 at 4:22pm

जनाब लक्षमण धामी जी इस रचना पर बधाई स्वीकार करें। आदरणीय समर साहिब की बातों पर ध्यान दें।

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