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*मन मनोरम* छ्न्द में गीत.....

*रोज चौकन्नी रहूँ मै,*
*किन्तु हरजाई न आये |*
*और मेरे मन भवन में,*
*मौन परछाईं न आये |*

खिल रहे थे पुष्प उर में,
साँझ आते ये झरे हैं।
भूल मैं सुधि-बुधि गयी हूँ,
साख उर के ये हरे हैं।
आंख मेरी ये थकी हैं।
लौट तरुणाई न आये।

*रोज चौकन्नी रहूँ मै,*
*किन्तु हरजाई न आये |

चाँदनी बिखरी पड़ी थी,
भर लिया दामन में है।
जब भी पिघले अश्रुजल ये,
चख लिया सावन में है।
वेदना बढ़ती गयी थी,
किन्तु करुणाई न आये।

*रोज चौकन्नी रहूँ मै,*
*किन्तु हरजाई न आये |*

दीप गर बन तुम गए हो
लौ की भाँति मैं जली हूँ।
रख अगर आगोश में लो
अंततः मैं ही ढली हूँ।
बीतती ये रात जाती
कन्त अरुणाई न आये।

*रोज चौकन्नी रहूँ मै,*
*किन्तु हरजाई न आये |*

अप्रकाशित/मौलिक

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Comment by अनहद गुंजन on August 20, 2017 at 8:10pm
आदरणीय बृजेश कुमार जी सादर आभार आपका.....☺
Comment by अनहद गुंजन on August 20, 2017 at 8:09pm
आदरणीया सुनन्दा जी विशेष आभार आपकी स्नेह पूर्ण टिप्पणी कर सराहना करने के लिए.....☺☺
Comment by अनहद गुंजन on August 20, 2017 at 8:08pm
हौसला अफाजाई करने के लिए आदरणीय मोहित जी आपका हार्दिक आभार....../\......
Comment by sunanda jha on August 20, 2017 at 3:12pm
वाहहहहह आदरणीया गुँजन जी बहुत ही प्यारा गीत मन्मनोरम छंद में ।हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 18, 2017 at 10:41pm
बहुत अनुपम मधुर गीत हुआ आदरणीया..हार्दिक बधाई

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