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यह चक्र धारी तिरंगे में ही नज़ाफ़त है-----पंकज मिश्र

1212 1122 1212 22

मेरे वतन की फ़िज़ाओं में जो मुहब्बत है
इसे बचाऊँ मैं हर हाल, मेरी चाहत है

हिमालया से लगायत महान सागर तक
परम पिता ने लिखी हिन्द की ये आयत है

तमाम लोगों ने कोशिश करी बदलने की
मगर वो हारे, विविधता में इसकी ताकत है

सफ़ेद पगड़ी हरा कुर्ता केसरी धोती
ये चक्र धारी तिरंगे में ही नज़ाफ़त है

अज़ान भी है भजन भी है चर्च की घण्टी
इसी वजह से वतन अपना खूबसूरत है

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 9, 2017 at 4:55pm
आदरणीय ब्रजेश जी सादर आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 9, 2017 at 4:54pm
आदरणीय विजय सर सादर आभार
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 8, 2017 at 12:58pm
बड़ी ही खूबसूरती को समेटे हुए शानदार ग़ज़ल..सादर
Comment by vijay nikore on August 7, 2017 at 1:11pm

अच्छी गज़ल के लिए बधाई

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 7, 2017 at 12:05pm
आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ सर बहुत बहुत आभार, आदरणीय बाऊजी का सुझाव सर्वथा उचित है....।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 7, 2017 at 12:04pm
आदरणीय सुरेन्द्रनाथ सर सादर आभार।
Comment by Mohammed Arif on August 7, 2017 at 8:25am
आदरणीय पंकज जी आदाब, देशभक्ति के ज़्बे से भरपूर बेहतरीन ग़ज़ल । हर शे'र लाजवाब है । भारत समानता और भाईचारे पर ही टिका है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की सलाह पर ग़ौर करें ।
Comment by नाथ सोनांचली on August 7, 2017 at 8:23am
आद0 पंकज जी बेहतरीन सृजन, राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत, बधाई इस सृजन पर
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 6, 2017 at 6:31pm
आदरणीय गिरिराज सर सादर अभिवादन और हार्दिक आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 6, 2017 at 6:30pm
आदरणीय तस्दीक अहमद सर सादर अभिवादन और हार्दिक आभार

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