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अभिलाषाओं के ...

अभिलाषाओं के   ... 

थक जाते हैं
कदम
ग्रीष्म ऋतु की ऊषणता से

मगर
तप्ती राहें
कहाँ थकती हैं


अभिलाषाओं की तृषा
पल पल
हर पल
ग्रीष्म की ऊषणता को
धत्ता देती
अपने पूर्ण वेग से
बढ़ती रहती है

ज़िंदगी
सिर्फ़ छाँव की
अमानत नहीं
उस पर
धूप का भी अधिकार है
जाने क्यूँ
धूप का यथार्थ
जीव को स्वीकार्य नहीं


भ्रम की छाया में
यथार्थ के निवाले
भूल जाता है
समय की सुईयों पे
ग्रीषम की चुभन
जब
जीवन की अपेक्षाओं को चीरती है
तो शेष बस
यथार्थ के अवशेष रहते हैं
अंजलि रिक्त रहती है
अट्टहास करते
क्षण क्षण भंगुर होती
अभिलाषाओं के जीवित बस
क्षीण विदीर्ण से
भेष रहते हैं

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on April 16, 2017 at 4:55pm

आदरणीय   Samar kabeer जी प्रस्तुति को अपने स्नेहिल शब्दों से आत्मीय मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on April 16, 2017 at 4:54pm

आदरणीय   Mohammed Arif   जी प्रस्तुति को अपने स्नेहिल शब्दों से आत्मीय मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by Samar kabeer on April 15, 2017 at 6:02pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,मौसम के हिसाब से बिम्बों का प्रयोग करके आपने बहुत अच्छी कविता रच दी,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Mohammed Arif on April 15, 2017 at 6:01pm
आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, क्या ख़ूब ग्रीष्म की तपन के साथ अभिलाषाओं की अभिव्यक्ति हुई है । हर पंक्ति दिल को छू लेने वाली । हार्दिक बधाई ।

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