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गज़ल - किसी हाथ में अब तक खंज़र ज़िन्दा है - ( गिरिराज भंडारी )

22   22   22   22   22   2 ( बहरे मीर )

किसी हाथ में अब तक खंज़र ज़िन्दा है

***********************************

सबके अंदर एक सिकंदर ज़िन्दा है

इसीलिये हर ओर बवंडर ज़िन्दा है  

 

सब शर्मिन्दा होंगे, जब ये जानेंगे

अभी जानवर सबके अंदर ज़िन्दा है

 

मरा मरा सा बगुला है बे होशी में

लेकिन अभी दिमाग़ी बन्दर ज़िन्दा है

 

फूलों वाला हाथ दिखा असमंजस में

किसी हाथ में अब तक खंज़र ज़िन्दा है

 

परख नली की बातों में कुछ घृणा दिखी

देख, अभी तक जंतर मंतर ज़िंदा है

 

अगर सुदामा कहीं दिखे, तो मानो तुम

दिखा नहीं है, लेकिन गिरधर ज़िंदा है

 

चक्र व्यूह रचने वाले ये याद रखें

अर्जुन जैसा एक धनुर्धर ज़िंदा है

 

क़दम ताल ही किये अभी तक, चले कहाँ  

अभी वहीं है दूरी, अंतर ज़िन्दा है.

 

ज़रा ज़रा विष सब कंठों मे रखते हैं

सब में थोड़ा थोड़ा शंकर ज़िन्दा है

************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित    -- संशोधित

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Comment by गिरिराज भंडारी on February 3, 2017 at 8:19pm

आदरणीय पंकज भाई . गज़ल की सराहना के लिये आपका ह्र्दय से आभारी हूँ ।

Comment by Mohammed Arif on February 2, 2017 at 9:56pm
जनाब गिरिराज भंडारीजी आदाब, उम्दा ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाकद क़ुबूल करें ।
Comment by Samar kabeer on February 2, 2017 at 5:55pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 2, 2017 at 12:22pm

आ. भाई गिरिराज जी इस लाजवाब प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई .

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 2, 2017 at 9:37am
परख नली की बातों में कुछ घृणा दिखी
देख, अभी तक जंतर मंतर ज़िंदा है......आदरणीय गिरिराज सर, बहुत खूबसूरती से कृत्रिमता पर प्रहार हुआ है, बहुत खूब।।
क़दम ताल ही किये अभी तक, चले कहाँ
"मंज़िल दूर अभी भी अंतर ज़िंदा है"........ संशोधन के लिए सुझाव भर।।

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