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ग़ज़ल : दिल ये करता है के अब साँप ही पाला जाए

बह्र : 2122 1122 1122 22

 

दिल के जख्मों को चलो ऐसे सम्हाला जाए

इसकी आहों से कोई शे’र निकाला जाए

 

अब तो ये बात भी संसद ही बताएगी हमें

कौन मस्जिद को चले कौन शिवाला जाए

 

आजकल हाल बुजुर्गों का हुआ है ऐसा

दिल ये करता है के अब साँप ही पाला जाए

 

दिल दिवाना है दिवाने की हर इक बात का फिर

क्यूँ जरूरी है कोई अर्थ निकाला जाए

 

दाल पॉलिश की मिली है तो पकाने के लिए

यही लाजिम है इसे और उबाला जाए

 

दो विकल्पों से कोई एक चुनो कहते हैं

या अँधेरा भी रहे या तो उजाला जाये

------------

(मौलिक एवंं अप्रकाशित)

Views: 404

Comments are closed for this blog post

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 1, 2017 at 7:30pm

शुक्रिया आदरणीय आशीष यादव जी

Comment by आशीष यादव on December 23, 2016 at 1:31am
Vicharwan ghazal. Har sher arthpurna.
Badhai swikar karen.

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