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तुम्हारी ज़िन्दगी में ....

तुम्हारी ज़िन्दगी में ....

चलो
तुम ही बताओ
आखिर
कहाँ हूँ

मैं
तुम्हारी ज़िन्दगी में

नसीमे सहर में
स्याह रात के सितारों में
बरसात की बूंदों में
झील के माहताब में
या
तुम्हारी बन्द पलकों के
ख्वाब में

आखिर
कहाँ हूँ

मैं
तुम्हारी ज़िन्दगी में

तेज़ पानी में
बहती कागज़ की
कश्तियों में
साहिलों के बाहुपाश में लिपटी
सागर की लहरों में
कायनात के नज़ारों में
खामोशियों के लिहाफ़ में सिसकते
अधूरी मुहब्बत के
शरारों में

आखिर
कहाँ हूँ

मैं
तुम्हारी ज़िन्दगी में

किसी लम्हे के
आगाज़ में
या किसी लम्हे के
अंजाम में

तुम ही बताओ न
आखिर
कहाँ हूँ

मैं
तुम्हारी ज़िन्दगी में

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on November 10, 2016 at 3:54pm

आदरणीय गिरिराज भाई साहिब प्रस्तुति को अपने आत्मीय शब्दों से सरहाने के लिए आपका दिल से आभार। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 10, 2016 at 8:56am

आदरनीय सुशील सरना भाई , बहुत भाव पूर्ण और सुगड़ रचना हुई है , हार्दिक बधाइयाँ आपको ।

Comment by Sushil Sarna on November 8, 2016 at 1:49pm

आदरणीय समर कबीर साहिब प्रस्तुति के भावों को आत्मीय सम्मान देने का दिल से आभार। 

Comment by Samar kabeer on November 7, 2016 at 5:30pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत अच्छी शाइरी हुई है इस कविता में,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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