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अंत के गर्भ में .....

अंत के गर्भ में .....

मैं
व्यस्त रही
अपने बिम्बों में
तुम्हारे बिम्ब को
तलाशते हुए

तुम
व्यस्त रहे
अपने
स्वप्न बिम्बों को
तराशने में

हम
व्यस्त रहे
इक दूसरे में
इक दुसरे को
ढूंढने में

पर
वक्त ने
वक्त न दिया
हम
ढूंढते ही रह गए
आरम्भ को
अंत के गर्भ में

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on November 5, 2016 at 6:32pm

आदरणीय समर कबीर साहिब अदना से पेशकश को आपने ज़र्रे से आफताब का खिताब दे दिया है। इस इज़्ज़त के लिए बन्दा आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार है। 

Comment by Samar kabeer on November 5, 2016 at 2:39pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत गम्भीर और फ़िक्र भी बहुत गहरी,क्या बात है,बेहद शानदार,इस बहतरीन कविता के लिये दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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