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बहरे हज़ज़ मुसम्मन मक्बुज.....

मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन  मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन 
1212      1212       1212      1212
सरे निगाह शाम से ये क्या नया ठहर गया 

​​कदम बढ़ा सके न थे कि हादसा गुजर गया

ये कौन सीं हैं मंजिलें ये क्या गज़ब है आरजू 
जिसे सँभाल कर रखा वही समा बिखर गया

अभी है वक़्त बेवफा अभी हवा भी तेज है 
अभी यहीं जो साथ था वो हमनवा किधर गया

ये वादियाँ ये बस्तियाँ ये महफ़िलें ये रहगुजर 
हज़ार गम गले पड़े जहाँ जहाँ जिधर गया

समेट कर ये हौंसले मक़ाम को निकल पड़ो 
जो थक गया बहक गया वो लौट अपने घर गया

  
खुदा की नेंमतें मिलीं तो ज़िन्दगी सँवार 'ब्रज'
अगर न उसके दर गया जहाँ से दर बदर गया 

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

बृजेश कुमार 'ब्रज'
 

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 23, 2016 at 11:33am
रचना पटल पे आपकी गरिमामई उपस्थिति उत्साहवर्धक है आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी
Comment by नाथ सोनांचली on October 17, 2016 at 2:33pm
आदरणीय बृजेश कुमार ब्रज जी सादर अभिवादन! आपकी खुबसूरत गजल के लिए मेरी कोटिश बधाई कबूल फरमाएं
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 16, 2016 at 3:30pm

आपका हार्दिक अभिनंदन एवं आभार आदरणीय  सुरेश कुमार 'कल्याण' जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 16, 2016 at 3:28pm

रचना पटल पे आपका हार्दिक अभिनंदन एवं आभार आदरणिया सुचिसंदीप अग्रवालl जी 

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 15, 2016 at 8:30pm
आदरणीय ब्रजेश जी खूबसूरत गजल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें । सादर ।
Comment by शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" on October 15, 2016 at 1:32pm
ब्रजेश भाई बहुत ही शानदार रचना हेतु बधाई।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 13, 2016 at 10:21pm

आदरणीय  Samar kabeer साहब आपकी द्वारा की गई हौसलफजाई से अत्यधिक संबल मिलता है....आपका हार्दिक अभिनंदन एवं आभार...ये मेरी इस मापनी पे पहली सफल कोशिश है....

Comment by Samar kabeer on October 13, 2016 at 2:49pm
जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज'साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।

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