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कविता - "उत्कर्ष"/अर्पणा शर्मा

“उत्कर्ष“
एक टिमटिमाते, बुझते तारे का उत्कर्ष,
देख लोग, होते चमत्कृत,
लेकिन वे बूझने में असमर्थ,
उसका नैपथ्य में छिपा,
गहन, सतत संघर्ष,
रुपहली चमक के पीछे छिपे,
कालिमा के सुदीर्घ, लंबे वर्ष,
फिर भी आशाओं से परिपूर्ण,
बाधाएँ, चुनौतियाँ पार कर,
उत्साहित, प्रसन्नचित्त, प्रकाशमान सहर्ष,
प्रोत्साहन देता अनूठा, गांभीर्य शब्द संघर्ष,
छिपा गूढ इसमें तात्पर्य,
ड़टे रहो कर्तव्यपथ पर “ संग + हर्ष",
अब दूर कहीं मुसकुराता है,
जगमगाता है वो नन्हा तारा,
पाकर जीवन का उत्कर्ष..!! :-

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by Arpana Sharma on October 7, 2016 at 3:22pm
बहुत शुक्रिया आपका आदरणीय श्रीमान् समर कबीर साहाब।
Comment by Samar kabeer on October 6, 2016 at 11:08pm
मोहतरमा अर्पणा शर्मा जी आदाब,अच्छी लगी आपकी रचना इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Arpana Sharma on October 5, 2016 at 11:19pm

आपकी सह्रदय सराहना से मेरी कविता सार्थक हुई आदरणीया कल्पना जी, श्रीमान् शिज्जू जी एवं श्रीमान् कालीपद प्रसाद जी । सादर नमन।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 5, 2016 at 5:00pm

अच्छी भावपूर्ण रचना हुई है आदरणीया अपर्णा जी | हार्दिक बधाई |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 5, 2016 at 4:27pm

अच्छी भावाभिव्यक्ति हुई है आ. अर्पणा जी

Comment by Kalipad Prasad Mandal on October 5, 2016 at 7:04am

इस गहन भाव युक्त कविता के लिए आपको बधाई आ अपर्णा जी !

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