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ग़ज़ल ( साजन के तेवर देख कर )

ग़ज़ल
--------
फ़ाइलातुन -फ़ाइलातुन -फ़ाइलातुन -फाइलुन

चाहता है सिर्फ़ दिल मेरा ये मंज़र देख कर ।
फोड़ लूँ मैं अपनी आँखें उनको मुज़्तर देख कर ।

ज़िन्दगी में भी वो आजाएं जो मेरे दिल में हैं
सोचता रहता यही हूँ उनको अक्सर देख कर ।

हर किसी के पास तो होता नहीं ख़ुद का मकाँ
किस लिए हैं आप हैराँ मुझको बे घर देख कर ।

किस में हिम्मत है बढाए दोस्ती का हाथ जो
आस्तीं में आपकी पोशीदा खंज़र देख कर ।

फिर मुसीबत ना गहानी आने वाली है कोई
ऐसा लगता है मुझे उन्से सितमगर देख कर ।

हम हैं वह साजिद जो हर दहलीज़ पर झुकते नहीं
सौदे बाज़ी कर अमीरे शहर तू सर देख कर ।

कर दिया तस्दीक़ उनको दोस्तों ने बद गुमाँ
हो रहा है यह गुमाँ साजन के तेवर देख कर ।


उन्स ------मुहब्बत
मुज़्तर ---बे क़रार

(मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on September 21, 2016 at 7:36pm

मोहतरम जनाब शकूर साहिब ,  ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ---


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 21, 2016 at 2:44pm

मुहतरम जनाब तस्दीक़ अहमद साहब आपकी ग़ज़ल पर कुछ सार्थक चर्चाएँ हुईं  हैं पाठकों को ज़रूर फायदा मेरी तरफ से बधाई आपको इस रचना के लिए

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on September 20, 2016 at 7:57pm

मोहतरम जनाब  सुरेश कुमार  साहिब  , ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का   बहुत बहुत शुक्रिया ---

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on September 20, 2016 at 7:56pm

मोहतरम जनाब  समर कबीर  साहिब आदाब ,  वाक़ई  रंगे सितमगर से मिसरा अच्छा लग रहा है ,  बहुत बहुत शुक्रिया ---

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on September 20, 2016 at 7:52pm

मोहतरम जनाब रवि साहिब ,ग़ज़ल में गहराई से शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ---

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 20, 2016 at 12:44pm
आदरणीय तसदीक अहमद साहब उम्दा गजल के लिए हार्दिक बधाई । सादर ।
Comment by Samar kabeer on September 19, 2016 at 10:08pm
अगर आप मुनासिब समझें तो ऐसा कर लें:-
"ऐसा लगता है मुझे रंग-ए-सितमगर देख कर"
Comment by Ravi Shukla on September 19, 2016 at 9:46pm
आदरणीय तस्दीक साहब उम्दा ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद कुबूल करे । एक पाठक के तौर पर आप लोगो के कलाम और उस पर आई टिप्पणियों से शब्द का प्रयोग और स्वरूप पर नई नई जानकारी मिलती है आपका और आदरणीय समर साहब का अभारं । सादर
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on September 19, 2016 at 8:14pm

मोहतरम जनाब समर कबीर साहिब आदाब , ग़ज़ल में गहराई से शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया -----मश्वरे के लिए शुक्रिया , उन्से सितमगर की जगह हुब्बे सितमगर कर लिया है ---मिहरे सितमगर भी हो सकता है 

Comment by Samar kabeer on September 19, 2016 at 3:06pm
जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
पांचवें शैर के सानी मिसरे में"उन्स" के साथ इज़ाफ़त नहीं लगेगी,आपका शैर कमज़ोर लग रहा है ।

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