For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ये हवा मस्ती भरी इस पार तक आती तो है।।
तन को मेरे छु के मुझसे प्यार फ़रमाती तो है।।

गाँव की सुन्दर सी गालियाँ और उनकी याद सब।
संग मेरे खेतों की मिट्टी ये हवा लाती तो है।।

जिनकी नजरों में सिवा नफरत के न कुछ और था।
ये हवा झकझोर कर के जात बतलाती तो है।।

क्यों बुराई कर रहा है बाप माँ ही शान हैं।
नाव कितनी भी हो जर्जर पार ले जाती तो है।।

क्यों नही है काम की लिक्खी गई ये पुस्तकें।
धूल इनपर है चढ़ी दीमक इन्हें खाती तो है।।

चुप कहाँ इस दौर में है हर्फ़ लिख कर वो मेरा।
बेवजह में ही सही पर रूह से गाती तो है।।

क्या समझ पाए ज़माना मूक हैं सब आयतें।
मूक भाषा ही सही पर राह बतलाती तो है।।

ये कुरां गीता ये बइबिल मात्र बस इक राह हैं।
नेक इंसानों को मंजिल तक ये पहुचती तो है।।
मौलिक / अप्रकाशित

Views: 492

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by amod shrivastav (bindouri) on September 8, 2016 at 11:43am
जी आदर नीय अप का भी आभार नमन
आगे भी मार्गदर्शन देते रहे । कोशिश करूँगा और अच्छे भावों को संजोने का ....

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 8, 2016 at 11:13am

ये हवा मस्ती भरी इस पार तक आती तो है।।
तन को मेरे छू के मुझसे प्यार फ़रमाती तो है।।

गाँव की सुन्दर सी गलियाँ और उनकी याद सब।
संग मेरे खेतों की मिट्टी ये हवा लाती तो है।।

अच्छी ग़ज़ल है आमोद भाई प्रयासरत रहें और जनाब समर कबीर साहब ने बाकी बता ही दिया है

Comment by Samar kabeer on September 7, 2016 at 9:59pm
दूसरे शैर का सानी मिसरा इस तरह देखिये:-
"संग मेरे खेतों की मिट्टी हवा लाती तो है"
Comment by amod shrivastav (bindouri) on September 7, 2016 at 6:43pm
आ समर साहब जी सादर प्रणाम
हाँ सर अरकान लिखना भूल गया हु । क्षमा चाहता हूँ । और सर पहुंचती शब्द की भी जानकारी नही थी आइंदा इस बात का भी लिखते वक्त ख्याल किया करूँगा ....सर दुसर्र शेर में मैंने संग 2 मिरे 12 में गिना है । तो आप बताए अगर गलत है तो मै फिर उसे कुछ" लिख सकता हूँ । पर इस पर मार्गदर्शन जरुर दीजियेगा ........obo की बेब का शुक्र गुजार हु क्यू की गजल नाम की जो बला है । वो इस मंच से अच्छा कही और नही सीख सकता ..एक बार फिर मंच कइ सभी गुरुजनों जानकारों को प्रणाम आ समर सर आप को भी प्रणाम
Comment by Samar kabeer on September 7, 2016 at 4:22pm
जनाब आमोद श्रीवास्तव जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
दूसरे शैर का सानी मिसरा लय में नहीं देखियेगा

आख़री शैर में रदीफ़ सही लिखें'पहुंचती'की जगह पहुंचती ल8खा है ।
ग़ज़ल के साथ आपने अरकान भी नहीं लिखे जो इस मंच का नियम है,आइन्दा से लिख दिया करें ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri posted a blog post

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं

ग़ज़ल 2122  1212  22वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैकितने दुःख दर्द से भरा दिल हैये मेरा क्यूँ हुआ है…See More
4 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया से समृद्ध हुआ । हार्दिक आभार आदरणीय । फागोत्सव…"
yesterday
Nilesh Shevgaonkar and Dayaram Methani are now friends
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212   22 वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है कितने दुःख दर्द से भरा दिल…"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२***पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१। *…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"जय-जय सादर"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"बेटा,  व्तक्तिवाची नहीं"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय दयाराम जी, रचनाकार का काम रचनाएँ प्रस्तुत करना है। पाठक-श्रोता-समीक्षक रचनओं में अपनी…"
Saturday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आदरणीय सौरभ पांडेय जी, हर रचना से एक संदेश देने का प्रयास होता है। मुझे आपकी इस लघु कथा से कोई…"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी जी।  आप उन शब्दों या पंक्तियों को…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-131 (विषय मुक्त)
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई। एक दो जगह टंकण त्रुतियाँ रह…"
Saturday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service