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ग़ज़ल: शूलियों पर चढ़ चुकी सम्वेदनायें

212 22 12 22122

शूलियों पर चढ़ चुकी सम्वेदनायें ।
बाप के कन्धों पे बेटे छटपटाएं ।।

लाश अपनों की उठाये फिर रहा है ।
दे रही सरकार कैसी यातनाएं ।।

है यही किस्मत में बस विषपान कर लें ।
दर्द की गहराइयां कैसे छुपाएँ ।।

सिर्फ खामोशी का हक अदने को हासिल ।
डूबती हैं रोज मानव चेतनाएं ।।

हम गरीबों का खुदा कोई कहाँ है ।
मुफलिसी पर हुक्मरां भी मुस्कुराएं।।

वो करेंगे जुर्म का अब फैसला क्या ।
जो नचाते सैफई में अप्सराएं ।।

- नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by kanta roy on September 4, 2016 at 2:56pm
सिर्फ खामोशी का हक अदने को हासिल ।
डूबती हैं रोज मानव चेतनाएं..... बेहद गम्भीर अशआर है आपकी इस गजल के। बधाई आपको।
Comment by Naveen Mani Tripathi on September 3, 2016 at 5:44am
आ0 भंडारी सर विशेष आभार । शेर को आपने और बेहतर बना दिया ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on September 3, 2016 at 5:42am
बहुत बहुत शुक्रिया आ0 कबीर साहब ।
Comment by Samar kabeer on September 2, 2016 at 10:17pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,आपकी ग़ज़लों का सफ़र शही दिशा में हो रहा है,ये देख कर ख़ुशी हुई ।
ये ग़ज़ल भी उम्दा हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
मतले के ऊला मिसरे में 'शूलियों' को "सूलियों"कर लें ।
चौथे शैर के ऊला मिसरे में 'अदने'को "अदना"कर लें ।
थोड़ा सा उर्दू शब्दकोष का अध्यन कर लेंगे तो आपकी ग़ज़लें और निखर जाएँगी।
Comment by Samar kabeer on September 2, 2016 at 9:28pm
आपकी इस्लाह के बाद ये शैर मतला बन जायेगा,यानी तक़ाबुल-ए-रदीफेन का दोष ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 2, 2016 at 9:42am

आदरणीय नवीन भाई , लाजवाब सामयिक गज़ल कही है , सभी अशआर बहुत खूब कहे हैं , दिले मुबारक बाद कुबूल कीजिये ।

है यही किस्मत में बस विषपान कर लें ।
दर्द की गहराइयां कैसे छुपाएँ ।।      इस शे र पर एक गैर ज़रूरी सलाह है , अगर अच्छी लगे तो स्वीकार करें

डर यही है अश्क़ बाहर आ न जायें ।
दर्द की गहराइयां कैसे छुपाएँ ।।       ये हुस्ने मतला हो जायेगा ।

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