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कितना अच्छा होता .....

कितना अच्छा होता .....

कितना अच्छा लगता है
फर्श पर
चाबी के चलते खिलौने देखकर
एक ही गति
एक ही भाव
न किसी से कोई गिला
न शिकवा
ऐ ख़ुदा
कितना अच्छा होता
ग़र तूने मुझे भी
शून्य अहसासों का
खिलौना बनाया होता
अपना ही ग़म होता
अपनी ही ख़ुशी होती
न लबों से मुस्कराहट जाती
न आँखों में नमी होती
सब अपने होते
हकीकत की ज़मीं न होती
ख़्वाबों का जहां न होता
बस ऐ ख़ुदा
तूने हमें भी वो चाबी अता की होती
तो न कोई तड़प होती
न कोई अरमां होता

ये
दिल
दर्द से आशना होता

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on October 4, 2016 at 10:27pm

आद.  Arpana Sharma जी प्रस्तुति पर आपकी आत्मीय बधाई का हार्दिक आभार। 

Comment by Arpana Sharma on October 4, 2016 at 3:42pm
आदरणीय सुशील जी, बहुत ही सुंदर भावार्थ लिए कविता है। आपको बहुत बधाई
Comment by Sushil Sarna on October 3, 2016 at 2:48pm

आदरणीय  PRAMOD SRIVASTAVA जी प्रस्तुति पर आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया एवम आत्मीय बधाई का हार्दिक आभार। 

Comment by PRAMOD SRIVASTAVA on October 3, 2016 at 2:44pm

बहुत ही सुंदर रचना के लिए बधाई ।

Comment by Sushil Sarna on September 28, 2016 at 3:34pm

आदरणीय रामबली गुप्ता जी प्रस्तुति पर आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया एवम आत्मीय बधाई का हार्दिक आभार। 

Comment by रामबली गुप्ता on September 23, 2016 at 11:36am
वाकई अनूठी रचना हुई है आद0 भाई सुशील सरना । दिल से बधाई लीजिये।
Comment by Sushil Sarna on September 22, 2016 at 8:29pm

आदरणीय कल्पना भट्ट जी प्रस्तुति पर आपकी आत्मीय बधाई का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on September 22, 2016 at 8:29pm

आदरणीय शिज्जु शकूर जी प्रस्तुति पर आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया एवम आत्मीय बधाई का हार्दिक आभार। 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 22, 2016 at 4:02pm

आदरणीय सुशिल सरना जी बहुत बहुत बधाई |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 22, 2016 at 3:43pm

आदरणीय सुशील सरना सर आपकी रचना को महीने की सर्वश्रेष्ठ चुने जाने पर बहुत बहुत बधाई

कृपया ध्यान दे...

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