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उनकी शाम दे दो ....

उनकी शाम दे दो ....

आज
सहर में अजीब उजास है
हर शजर पर
समर के मेले हैं
सबा में अजीब सी
मदहोशी है
साँझ के कानों में
तारीक की सरगोशी है

शायद किसी को
मेरी तन्हाई पे
तरस आया है
किसके हैं लम्स
कौन मेरे करीब आया है
मुद्दतों की नमी ने
आज सब्र पाया है
लम्हे रुके से लगते हैं
अब्र झुके झुके लगते हैं
देखो ! तरीक के कन्धों पे
शाम झुकी है
सहर भी कुछ रुकी रुकी है
पसरती सम्तों में
पसरती तन्हाईयों को
अब तो विराम दे दो
बहुत सहा दर्द हिज्र का
अब तो आराम दे दो
लौट भी आओ
कि *मुज़्तरिब इन साँसों को (*मुज़्तरिब=बैचैन)
उनकी शाम दे दो

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on July 27, 2016 at 1:40pm

आदरणीय   सुरेश कुमार 'कल्याण'   जी प्रस्तुति को अपने  स्नेहिल शब्दों से मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on July 26, 2016 at 8:24pm
रचना बहुत अच्छी एवं सुंदर है शब्द चयन काफी कठिन महसूस हुआ। बधाई हो आदरणीय।
Comment by Sushil Sarna on July 26, 2016 at 12:57pm

आदरणीय shree suneel       जी प्रस्तुति को अपने स्नेहिल शब्दों से मान  देने का तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by shree suneel on July 26, 2016 at 2:43am
ख़ूब! भावपूर्ण प्रस्तुति! हार्दिक बधाई आपको आदरणीय सुशील सरना सर जी. सादर.

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