For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

कभी आके खुद तुम यहाँ देख लेना-ग़ज़ल

122 122 122 122
कभी आके खुद तुम यहाँ देख लेना।
मेरे इश्क़ की, इन्तेहाँ देख लेना।

यकीं इश्क़ पर गर, चे कम हो कभी भी।
तो ग़ज़लों का मेरी, जहाँ देख लेना।।

मिलेगा न मुझसा, दिवाना कहीं भी।
यहाँ देख लो फिर वहाँ देख लेना।।

मेरे हौसले की न पूछो कहानी।
झुकाऊँगा मैं, आसमाँ देख लेना।।

चलाना जो खंज़र, बचा लेना दिल को।
सजाया तुम्हें है, कहाँ देख लेना।।


मिलेगी यहाँ सिर्फ तस्वीर तेरी।
यही धन किया है जमाँ देख लेना।।


मौलिक अप्रकाशित

Views: 391

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on June 8, 2016 at 11:37am
आदरणीय श्री सुनील सर सादर आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on June 8, 2016 at 11:36am
आदरणीय गिरिराज सर, सादर प्रणाम। जमाँ पर मुझे भी संदेह है।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on June 8, 2016 at 11:36am
आदरणीय महर्षि तिवारी जी सादर धन्यवाद
Comment by shree suneel on June 8, 2016 at 10:40am
इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए आपको बधाई आदरणीय पंकज जी. सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 8, 2016 at 8:16am

आदरनीय पंकज भाई , अच्छी गज़ल कही है , हार्दिक बधाइयाँ आपको ।
एक बात -

जमाँ काफिया मेरे ख़याल से सही नहीं है , सही शब्द -- जमा - है ।

Comment by maharshi tripathi on June 7, 2016 at 5:19pm
अपने भावों को बखूबी आपने गज़ल में ढाला है
,यकीनन आपकी गज़ल से काफी कुछ सीखने को मिलेगा !!!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post आजकल इस देश में-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"जनाब लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है बधाई स्वीकार करें। समझाइश जनाब समर कबीर…"
4 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Md. Anis arman's blog post नज़्म
"बहुत ख़ूब! जनाब अनीस अरमान साहिब आदाब, उम्दा नज़्म कही आपने, मुबारकबाद पेश करता हूँ।  सादर।"
5 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हमने तो देखा बीज न खेतों में डालकर -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"जनाब लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ। मतले पर जनाब…"
5 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल-है कहाँ
"मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है बधाई स्वीकार करें। 2122 - 2122 - 2122 -…"
6 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Dharmendra Kumar Yadav's blog post एक सजनिया चली अकेली
"आदरणीय धर्मेंद्र कुमार यादव जी आदाब, सुंदर गीत लयबद्ध किया है आपने, बहुत बहुत बधाई स्वीकार…"
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post सावन के दोहे : ..........
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन ।सावन पर अच्छे दोहे हुए हैं । हार्दिक बधाई ।"
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on सालिक गणवीर's blog post मंज़िल की जुस्तजू में तो घर से निकल पड़े..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन ।अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई । सुधीजनों की टिप्पणी का…"
8 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on TEJ VEER SINGH's blog post आत्म घाती लोग - लघुकथा -
"आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । सुंदर समसामयिक कथा हुई है । हार्दिक बधाई स्वीकारें।"
8 hours ago
Chetan Prakash and Manan Kumar singh are now friends
11 hours ago
Dharmendra Kumar Yadav posted a blog post

एक सजनिया चली अकेली

संग न कोई सखी सहेली, रूप छुपाए लाजन से। एक सजनिया चली अकेली, मिलने अपने साजन से।मधुर मिलन की आस…See More
12 hours ago
Rachna Bhatia posted a blog post

ग़ज़ल-है कहाँ

2122 2122 2122 2121उनकी आँखों में उतर कर ख़ुद को देखा है कहाँहक़ अभी तक उनके दिल पर इतना अपना है…See More
13 hours ago
Chetan Prakash commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हमने तो देखा बीज न खेतों में डालकर -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"ओ के, जनाब, मुसाफ़िर, आपकी ग़ज़ल आपकी नज़र, आदाब  ! "
16 hours ago

© 2021   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service