For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

हे माँ तेरे चरणों की मैं धूल कहाँ से लाऊंगा,
रग रग में तू बसी हुई मैं भूल कहाँ से पाऊंगा।

तिनका तिनका बड़ा हुआ मैं ममता की इन छाँव में,
बात बात पर मुझे सिखाती किताब कहाँ से लाऊंगा।।

सबसे लड़ती मेरी खातिर गली मोहल्ले गांव में,
अब सब बन गए मेरे दुश्मन कैसे मैं बच पाउँगा

याद है एक दिन तूने मुझको यही पाठ सिखलाया था,
भाव सरल और मधुर वचन का सच्चा पाठ पढ़ाया था।।

दीन दुःखी की सेवा कर फिर जग में नाम कमाया था,
बनकर तेरे जैसा मैं अब कुछ तो पुण्य कमाऊँगा।

लेकिन अच्छे कर्मों की मैं पूंजी कहाँ से लाऊंगा
हे माँ तेरे चरणों की मैं धूल कहाँ से लाऊंगा।।

.

(नीरज खरे)
9473871781
(मौलिक एवम् अप्रकाशित)

Views: 608

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 2, 2016 at 6:29pm

आदरणीय नीरज भाई , मातृ भाव से पूर्ण आपकी रचना के लिये हार्दिक बधाई ।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on June 2, 2016 at 3:26pm

माँ तो माँ ही होती है | बहुत बहुत बधाई इस सुंदर रचना के लिए |

Comment by pratibha pande on June 2, 2016 at 12:04pm

सबसे लड़ती मेरी खातिर गली मोहल्ले गांव में,
अब सब बन गए मेरे दुश्मन कैसे मैं बच पाउँगा.....बिल्कुल,  हर माँ ऐसा ही करती है , माँ के प्यार की खुशबू में रची इस सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई आपको आदरणीय नीरज खरे जी 

Comment by Samar kabeer on June 1, 2016 at 12:27pm
जनाब नीरज खरे साहिब आदाब,पहली बार आपकी रचना से रूबरू हुआ हूँ ।
बहुत अच्छी लगी माँ को समर्पित ये कविता,दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Shyam Narain Verma on May 31, 2016 at 5:26pm
बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए ……………..

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

दोहा पंचक. . . .संयोग शृंगारअभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही…See More
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Friday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Thursday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service