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ग़ज़ल -- पाँव के नीचे से धरती सर से छप्पर ले गया। ( दिनेश कुमार )

2122--2122--2122--212

पाँव के नीचे से धरती सर से छप्पर ले गया
ज़लज़ला कुछ बेबसों के सारे गौहर ले गया

ज़िन्दगी के खुशनुमा लम्हों से वो महरूम है
शाम को जो साथ अपने घर में दफ़्तर ले गया

हौसला, हिम्मत, ज़वानी, ख़्वाहिशें, बे-फिक्र दिल
वक़्त का दरिया मेरा सब कुछ बहा कर ले गया

सारी दुनिया जीत कर भी हाथ खाली ही रहे
वक़्त-ए-रुख़सत इस जहाँ से क्या सिकन्दर ले गया

छु न पाये हाथ उसके जब मेरी दस्तार को
तैश में आकर वो काँधे से मेरा सर ले गया

जब हुआ ससुराल में नव-ब्याहता का दिल उदास
इक हवा का झोंका उसको पल में पीहर ले गया

मुझको महफ़िल में दिखानी थी तख़य्युल की उड़ान
मैं बिना पर के परिन्दों को फ़लक़ पर ले गया

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Ashok Kumar Raktale on June 23, 2016 at 1:16pm

वाह ! वाह ! खूब उम्दा अशआर हैं. मगर इसकी तो बात ही कुछ और है

जब हुआ ससुराल में नव-ब्याहता का दिल उदास
इक हवा का झोंका उसको पल में पीहर ले गया......वाह ! वाह !~

बहुत बधाई.

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on June 21, 2016 at 5:13pm
वाह दिनेश कुमार जी बहुत ही सुन्दर रचना है ।बधाई हो ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 19, 2016 at 11:30am

एक निहायत ही खूबसूरत ग़ज़ल जो वास्तव में माह  की  सर्वश्रेष्ठ रचना की हक़दार थी के लिए तहे दिल से बधाई दाद ..दाद  ..दाद 

Comment by दिनेश कुमार on May 24, 2016 at 6:40pm
शुक्रिया आ बशर साहब।
Comment by दिनेश कुमार on May 24, 2016 at 6:39pm
इनायत है आपकी आदरणीय निलेश सर जी। शुक्रिया
Comment by दिनेश कुमार on May 24, 2016 at 6:38pm
शुक्रिया आ बृजेश कुमार साहिब।
Comment by दिनेश कुमार on May 24, 2016 at 6:37pm
शुक्रिया आ जयनीत साहब।
Comment by दिनेश कुमार on May 24, 2016 at 6:36pm
शुक्रिया आ कान्ता साहिबा जी। इनायत है आपकी।
Comment by दिनेश कुमार on May 24, 2016 at 6:35pm
शुक्रिया आ बैजनाथ साहब।
Comment by दिनेश कुमार on May 24, 2016 at 6:34pm
शुक्रिया आ वंदना जी।

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