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जीवन पथ में, तेज़ धूप, तुम घने पेड़ की छाया माँ-ग़ज़ल

22-22-22-22-----22-22-22-2
जीवन पथ में, तेज़ धूप, तुम घने पेड़ की छाया माँ।
इस मन्दिर सा पावन दूजा, मन्दिर कहीं न पाया माँ।।

जब भी दुख के बादल छाये, मन तूफ़ाँ से घिरा कभी।
इस चेहरे पर दर्द की रेखा, और कौन पढ़ पाया माँ।।

तुम अपने सारे बच्चों  को, कैसे बांधे रखती हो।
जबकी सबके अलग रास्ते, फिर भी एक बनाया माँ।।

विह्वल व्यथित हृदय की धड़कन, ज्यूँ अमृत पा जाती है।
जब भी सर पर कभी स्नेह से, तुमने हाथ फिराया माँ।।

जब भी दर्द यहाँ उट्ठा है, चोट कहीं जब यहाँ लगी।
इन आँखों का पीर नैन से, तुमने सदा बहाया माँ।।


मौलिक-अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 12, 2016 at 9:54am
आदरणीय राजेश दीदी सादर प्रणाम्

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 12, 2016 at 9:15am

बहुत सुन्दर प्यारी ग़ज़ल हुई हार्दिक बधाईयाँ आ० पंकज जी 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 10, 2016 at 9:38am
आदरणीय सौरभ बहुत बहुत आभार और सादर प्रणाम
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 4, 2016 at 9:19am

आदरणीय मिथिलेश सर सादर धन्यवाद


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 3, 2016 at 4:38pm

आदरणीय पंकज जी, बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 2, 2016 at 7:59pm

बहुत खूब, पंकज भाई. कथ्य के हिसाब से अच्छी ग़ज़ल है. माँ परक इस ग़ज़ल को पढ़ कर मजा आ गया.हार्दिक बधाइयाँ.  

इस मात्रिक ग़ज़ल की खुसूसियत इसका प्रवाह ही हुआ करती है. उसी ओर आदरणीय नीलेश भाई ने ध्यानाकृष्ट किया है. उनकी सलाह वाकई श्लाघनीय और अनुकरणीय है. 

शुभेच्छाएँ

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 1, 2016 at 3:56pm
आदरणीय समर कबीर सर सादर प्रणाम। रचना की तारीफ के लिए सादर आभार। सुझाव पर अवश्य कार्य होगा।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 1, 2016 at 3:54pm
आदरणीय नीलेश सर, सादर अभिवादन स्वीकार करें। सुझाव सर्वथा उचित है,सुधार जल्द ही कर दूंगा।
Comment by Samar kabeer on May 1, 2016 at 2:44pm
जनाब पंकज कुमार मिश्रा जी आदाब,माँ को समर्पित अच्छी ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।
जनाब निलेश नूर जी के सुझाव पर ध्यान दीजिये ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 1, 2016 at 11:59am

बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई है...बधाई आपको 
.
तुम इतने सारे टुकड़ों को, कैसे बांधे रखती हो।..इस मिसरे को लयात्मकता बढाने के लिए 
इतने सारे टुकड़ों को तुम .. कैसे बांधे रखती हो। ...कर सकने के बारे में विचार करें 
फिर  टुकड़ों (ऊला) के साथ सानी में रास्ते ठीक प्रयोग नहीं होगा ...कोई और शब्द खोज सकें तो भाव सुदृढ़ होगा ..
सादर 

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