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अमासी रात मेरे घर के तारे ..

बह्र:-1222-1222-1222-1222
अमासी रात मेरे घर के तारे छीन लेती है।।
तूफानी रात आये तो गुजारे छीन लेती है।।

मैं आँखें बन्द रखता हूँ मेरी यादें छुपा कर के।
खुला पाती है जब भी वो नज़ारे छीन लेती है।।

मेरी किस्मत को ऐ मालिक कभी उम्दा भी लिख्खा कर।
ये हसरत जिन्दगानी के सहारे छीन लेती है।।

नशा जिनको है दौलत का उन्हें कोई ये समझाए।
ये लत हमसे जरुरत में हमारे छीन लेती है।।

नहीं है हमजुबां कोई मेरा इस दौर हाजिर में।
कसक इतनी मेरे दिल से शरारे छीन लेती है।।

किसी रददी से कागज को जो हालेदिल बयाँ कर दूँ।
कोई कविता गजल बनकर के सारे छीन लेती है।।
मौलिक/ अप्रकाशित
आमोद बिन्दौरी

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Comment by rajesh kumari on April 6, 2016 at 11:47am

वाह वाह बहुत अच्छी ग़ज़ल लिखी है आपने सभी अशआर शानदार हुए जिसके लिए दिल से बधाई लीजिये आमोद जी .मक्ते के  सानी में कुछ अटकाव एवं  भाव सम्प्रेषण में कमी सी  महसूस हो रही  है इसे ऐसे लिखें तो कैसा रहे 

ग़ज़ल बन कोई/मेरी कविता भाव सारे छीन लेती है |

Comment by Rahila on March 30, 2016 at 1:17am
नहीं है हमजुबां कोई मेरा इस दौर हाजिर में।
कसक इतनी मेरे दिल से शरारे छीन लेती है।। वाह्ह. .शानदार लिखते है आप आदरणीय आमोद जी! काबिले तारीफ़ है आपकी ग़ज़ल । यूं ही पढ़ती रही इस मंच पर इतनी उम्दा ग़ज़ले तो यकीनन ग़ज़लो का शौक हो जायेगा । बहुत बधाई ।सादर
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 29, 2016 at 10:06pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है आदरणीय आमोद जी। दाद कुबूल करें

Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 28, 2016 at 12:45pm
आ रामबली सर आप को सादर नमन
सर गजल की बिधा में हम बिलकुल नए है । कभी अच्छा तो कभी बहुत बुरा लिख जाता है । कोई गुरु न होने के कारण अकेले ही साहित्य का पथ चल रहे हैं। इसलिए त्रुटि के लिए सदा क्षमा प्रार्थी हूँ । .....कृपया मार्गदर्शन स्नेह देते रहें
Comment by रामबली गुप्ता on March 28, 2016 at 12:22pm
वाह वाह वाह क्या खूब ग़ज़ल कही आ.आमोद जी
Comment by Samar kabeer on March 28, 2016 at 11:52am
समीर नहीं जनाब 'समर'
Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 28, 2016 at 11:34am
आकांता दीदी उत्साह वर्धन और स्नेह के लिए सादर नमन....
Comment by amod shrivastav (bindouri) on March 28, 2016 at 11:34am
आ समीर साहब आप का स्नेह पा कर गर्वंवित महसूस हो रहा है। आप को सादर नमन
Comment by Samar kabeer on March 28, 2016 at 11:29am
जनाब आमोद बिन्दोरी जी आदाब,तरही मिसरे पर आपने अच्छी ग़ज़ल कही, बधाई स्वीकार करें
Comment by kanta roy on March 28, 2016 at 10:44am

अमासी रात मेरे घर के तारे छीन लेती है।।
तूफानी रात आये तो गुजारे छीन लेती है।।....वाह  !  क्या  खूब  ग़ज़ल  कही  है  आपने आदरणीय आमोद  जी , बधाई  आपको 

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