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ख़िज़ाओं का नहीं होता दरख़्तों पर असर कोई (ग़ज़ल)

1222 1222 1222 1222

गया है सींचकर जो बाग़-ए-दिल को, इक नज़र कोई
ख़िज़ाओं का नहीं होता दरख़्तों पर असर कोई

दिलों के दरमिया इक़रार कोई हो गया था,पर
न थी उनको ख़बर कोई, नहीं मुझको ख़बर कोई

मुक़द्दर हर किसी पे मेह्रबां होता नहीं यारो
कहीं क़दमों में है मंज़िल, भटकता दर-ब-दर कोई

भरोसा है हमें चारागरी पर हद से भी ज़्यादा
मरीज़-ए-इश्क़ पालेगा न मर्ज़ अब उम्र-भर कोई

सियासत खून पीने की बड़ी शौक़ीन लगती है
छुड़ा पाता ये चस्का खून का ऐ काश अगर कोई

तड़पकर-चीखकर इंसानियत, है आज मरणासन्न
कोई देता नहीं क्यों,दे ही दे अब तो ज़हर कोई

ख़लिश-कांटो भरी है, जो डगर जाती ख़ियाबां तक
न राह-ए-क़ामयाबी है अब इससे मुख़्तसर कोई
================================

जयनित कुमार मेहता
(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by मिथिलेश वामनकर on February 4, 2016 at 12:33am

आदरणीय जयनित जी, बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. अलिफ़-वस्ल का बखूबी प्रयोग किया है. आदरणीय समर कबीर जी की बात पर जरुर गौर कीजियेगा सादर 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 3, 2016 at 8:25pm

जनाब जयनित कुमार साहिब अच्छी ग़ज़ल कही है मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं। .... बह्र के हिसाब से शेर 4 का सानी मिसरा ,शेर 6 का ऊला मिसरा ,शेर 7 का सानी मिसरा एक बार ज़रूर देख लें /  शेर 5 के सानी मिसरे में अगर की जगह गर करने से बह्र में हो जायेगा /   मोहतरम जनाब  समर की बात सही है। ... शब्द ज़हर नहीं ज़ह्र है। ... शुक्रिया

Comment by Samar kabeer on February 3, 2016 at 6:00pm
जनाब जयनित कुमार मेहता जी आदाब,बहुत ही शानदार ग़ज़ल हुई है,सुनकर दिल बाग़ बाग़ हो गया,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं !
छटे शैर में क़ाफ़िया सही नहीं,सही शब्द है"ज़ह्र"देख लीजियेगा !

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