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साये....

रहने दो
तुम सायों की खामोशी क्या जानो
तुम सिर्फ खोखले अहसासों के
सूखे शज़र हो
साये का दर्द तो सिर्फ
ज़मीन सहती है
हर जिस्मानी खरोंच को
खामोशी से पी जाती है
उफ़ नहीं करती
रेज़ा रेज़ा बिखरती
तारीक में सिमट जाती है
जब कोई तन्हा शब
किसी परिंदे की तरह
पेड़ पर फड़फड़ाती है
बेतरतीब से सलवटों में
तब वफा भी कराहती है
गुजरे लम्हों के साये
तमाम उम्र
जीने की सजा दे जाते हैं
ज़िस्म की कश्कोल में
हर सांस
इक गदाई सी लगती है
हया की झीनी सी चादर पर
उसकी छुअन
एक बेहयाई से लगती है
साया खामोश रहता है
मगर हर लम्स में इक
साये की स्याही लगती है

कश्कोल=भिक्षा-पात्र ,गदाई = फ़क़ीरी 

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on December 16, 2015 at 6:17pm

आदरणीय   vijay nikore    जी प्रस्तुति को आत्मीय सम्मान देने के लिए आपका ह्रदयतल से आभारी हूँ। 

Comment by vijay nikore on December 16, 2015 at 3:17pm

बहुत ही आनन्द आया आपकी रचना पढ़ कर।

हार्दिक बधाई,  आदरणीय सुशील जी।

Comment by Sushil Sarna on December 5, 2015 at 6:28pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी रचना में निहित अहसासों को  आपने इतना मान दिया इसके लिए मैं आपका तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ। 


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Comment by rajesh kumari on December 5, 2015 at 10:13am

बहुत शानदार रचना आ० सुशील सरना जी ,दिल से बधाई लीजिये 

Comment by Sushil Sarna on December 4, 2015 at 12:41pm

आदरणीया   pratibha pande      जी प्रस्तुति में निहित भावों सम्मान देने के लिए आपका ह्रदयतल से आभारी हूँ। 

Comment by pratibha pande on December 4, 2015 at 12:30pm

गुजरे लम्हों के साये 
तमाम उम्र 
जीने की सजा दे जाते हैं 
ज़िस्म की कश्कोल

हर सांस 
इक गदाई सी लगती है ......आपकी रचनाओं  की गहराइयों में उतरते  हुए  हमेशा नए एहसासों  से मिलते हैं   हार्दिक बधाई आपको इस रचना कर्म के लिए आदरणीय सुशील जी 

Comment by Sushil Sarna on December 3, 2015 at 12:21pm

आदरणीय  TEJ VEER SINGH    जी रचना पर आपकी मधुर प्रशंसा का दिल से आभार।  

Comment by Sushil Sarna on December 3, 2015 at 12:20pm

आदरणीया  jyotsna Kapil      जी प्रस्तुति में निहित भावों सम्मान देने के लिए आपका ह्रदयतल से आभारी हूँ। 

Comment by Sushil Sarna on December 3, 2015 at 12:19pm

आदरणीय  Samar kabeer   जी प्रस्तुति को आत्मीय सम्मान देने के लिए आपका ह्रदयतल से आभारी हूँ। 

Comment by TEJ VEER SINGH on December 3, 2015 at 10:57am

हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरनाजी!बेहतरीन प्रस्तुति!

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