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बह्र : २२ २२ २२ २

 

पैसा जिसे बनाता है

उसको समय मिटाता है

 

यहाँ वही बच पाता है

जिसको समय बचाता है

 

चढ़ना सीख न पाये जो

कच्चे आम गिराता है

 

रोता तो वो कभी नहीं

आँसू बहुत बहाता है

 

बच्चा है वो, छोड़ो भी

जो झुनझुना बजाता है

 

चतुर वही इस जग में, जो

सबको मूर्ख बनाता है

-----------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 715

Comment

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Comment by Samar kabeer on June 13, 2015 at 10:50am
जनाब धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी,आदाब,वाह,अच्छी ग़ज़ल से नवाज़ा है आपने मंच को ,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।
Comment by shree suneel on June 13, 2015 at 8:51am
अच्छी ग़ज़ल हुई आदरणीय धर्मेंद्र जी.. बधाइयाँ आपको.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 13, 2015 at 8:42am

आदरणीय धर्मेन्द्र भाई , छोटी बहर में आपकी मास्टरी  हो गई है , क्या बात है !! दिली बधाइयाँ ॥

Comment by वीनस केसरी on June 12, 2015 at 11:18pm

बहुत खूब भाई

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 12, 2015 at 7:55pm

आ० धर्मेंद्र जी

पैसा जिसे बनाता है

उसको समय मिटाता है

 

यहाँ वही बच पाता है

जिसको समय बचाता है-----------शाश्वत वचन , बेहतरीन , सुन्दर .

 

Comment by Dr. Vijai Shanker on June 11, 2015 at 8:35pm

यहाँ वही बच पाता है
जिसको समय बचाता है
बहुत ही सुन्दर आदरणीय धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी , बधाई, सादर.

कृपया ध्यान दे...

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