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धड़कन भी खो जायेगी....

आओ न !
मेरे शब्दों को सांसें दे दो
हर क्षण तुम्हारी स्मृतियों में
मेरे स्नेहिल शब्द
तुम्हें सम्बोधित करने को
आकुल रहते हैं
गयी हो जबसे
मयंक भी उदासी का
पीला लिबास पहन
रजनी के आँगन में बैठ
तुम्हारे आने का इंतज़ार करता है
न जाने अपने प्यार के बिना
तुम कैसे जी लेती हो
यहाँ तो हर क्षण तुम्हारी आस है
तुम बिन हर सांस अंतिम सांस है
तुम नहीं जानती
तुम्हारी न आने की ज़िद क्या कहर ढायेगी
जिस्म रहेंगे मगर
जिस्मों से जान चली जाएगी
रजनी भी मयंक की उदासी न दूर कर पाएगी
वक्त की पालकी पे
ज़िंदगी भी यूँ ही गुज़र जाएगी
यादों की गर्द में
दिल भी खो जायेगा
धड़कन भी खो जायेगी

सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 730

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Comment by Sushil Sarna on June 10, 2015 at 3:52pm

आदरणीय  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी रचना  के मर्म पर आपकी आत्मीय   प्रशंसा का  हार्दिक आभार। 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 10, 2015 at 12:51pm

गयी हो जबसे
मयंक भी उदासी का
पीला लिबास पहन
रजनी के आँगन में बैठ
तुम्हारे आने का इंतज़ार करता है--------------क्या बात है सरना जी .  सादर.

Comment by Sushil Sarna on June 10, 2015 at 11:47am

आदरणीय सोमेश कुमार जी रचना  के मर्म पर आपकी आत्मीय   प्रशंसा का  हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on June 10, 2015 at 11:46am

आदरणीय मनोज कुमार अहसास जी रचना  के मर्म पर आपकी ऊर्जावान  प्रशंसा का  हार्दिक आभार। 

Comment by somesh kumar on June 9, 2015 at 11:11pm

आओ न !
मेरे शब्दों को सांसें दे दो
हर क्षण तुम्हारी स्मृतियों में
मेरे स्नेहिल शब्द
तुम्हें सम्बोधित करने को
आकुल रहते हैं

बहुत वेदना और आकुलता से भरे भाव |

नमन आपको

Comment by मनोज अहसास on June 9, 2015 at 6:50pm
बहुत व्याकुल पुकार
भावपूर्ण और अंतर्मन का संवाद
नमन
बधाई

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