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मुंह देखते हैं मेरा हुनर देखते नहीं

मफ़ऊल फ़ाइलात मफ़ाईल फ़ाइलुन/फ़ाइलान


मुंह देखते हैं मेरा हुनर देखते नहीं
हर दिल पे हो रहा है असर देखते नहीं

दीवाने अपने हाल से रहते हैं बेख़बर
किस सम्त हो रहा है सफ़र देखते नहीं

उर्यानियत के खेल इन्हें भी पसंद हैं
ख़ामोश हैं ये एहल-ए-नज़र देखते नहीं

वो देश हित की फ़िक्र में ग़लताँ हैं आज कल
ये और बात है कि इधर देखते नहीं

अंजान बन के पूछ रहे हो कि क्या हुवा
अख़बार में छपी है ख़बर देखते नहीं

कुछ देर और सब्र का दामन न छोड़ना
वो सामने खड़ी है सहर देखते नहीं

हर लम्हा जिन को इज़्ज़त-ओ-ग़ैरत का पास है
पगड़ी को देखते हैं वो सर देखते नहीं

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on June 10, 2015 at 5:09pm
जनाब राहुल डांगी जी,आदाब,काफ़ी समय बाद आप से मुलाक़ात हो रही है,कहाँ थे जनाब ?,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on June 10, 2015 at 5:08pm
दाद है भाई समीर कबीर जी उम्दा ग़ज़ल।
Comment by Samar kabeer on June 10, 2015 at 5:07pm
जनाब वीनस केसरी जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 10, 2015 at 11:42am

ज़िंदाबाद ..मुबारकबाद ..क्या बात 
शानदार .. कोई एक शेर चुनुं ये अन्याय होगा पूरी ग़ज़ल के साथ ..
हर शेर पर सलाम करता हूँ //

Comment by Rahul Dangi Panchal on June 10, 2015 at 10:17am
बहुत सुन्दर गजल हुई आदरणीय
Comment by वीनस केसरी on June 10, 2015 at 1:16am

वाह वा जिंदाबाद जिंदाबाद

Comment by Samar kabeer on June 9, 2015 at 11:27pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on June 9, 2015 at 11:26pm
मोहतरमा कांता रॉय जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on June 9, 2015 at 11:24pm
जनाब मोहन सेठी 'इंतज़ार' जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on June 9, 2015 at 11:22pm
जनाब विनय कुमार सिंह जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।

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