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एकदम उसके ज़बान पर चढ़ गया था ये शब्द " काना ", हंसी मज़ाक में किसी को भी बोल देता था वो ।
आज भी वही हुआ जब बचपन का एक मित्र आया और उसके साथ मज़ाक चल रहा था । अचानक किसी बात पर उसने बोल दिया " क्या यार काने हो क्या , इतना भी नहीं दिखता "।
और फिर वो एकदम से खामोश हो गया , दरअसल उसका बचपन का दोस्त वास्तव में काना था । उसे उस शब्द की पीड़ा का एहसास हो गया था ।
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on June 4, 2015 at 9:09pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय शुभ्रांशु पाण्डेय जी , सही कहा आपने .

Comment by Shubhranshu Pandey on June 4, 2015 at 8:40pm

आदरणीय विनय जी, 

किसी की कमी विशेष कर दैविक कमी को इंगित करते हुये हम ये भूल जाते हैं कि इससे वो व्यक्ति भी कितना आहत होता होगा. सुन्दर कथा.

सादर.

Comment by विनय कुमार on June 2, 2015 at 2:52pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 2, 2015 at 1:27pm

सहज उक्तियों के परिणाम भी कितने मर्मभेदी हुआ करते हैं, लघुकथा इसे उजागर करती है.

बढिया .. हार्दिक शुभकामनाएँ.

Comment by विनय कुमार on June 2, 2015 at 12:53pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय मोहन सेठी 'इंतज़ार' जी..

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on June 2, 2015 at 11:07am

किसी और की पीड़ा का एहसास हो जाये बस यही ज़रूरी है .....सटीक ...सादर 

Comment by विनय कुमार on June 1, 2015 at 10:57pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय महर्षि त्रिपाठी जी, अनजाने में ऐसे कई शब्द हम बोल जाते हैं जिनकी वज़ह से औरों को क्या तक़लीफ़ हो सकती है हम सोच भी नहीं पाते ..

Comment by maharshi tripathi on June 1, 2015 at 10:48pm

कभी कभी हम ,,अपने मस्ती के लिए कुछ ऐसे शब्द निकालते हैं ,जो दूसरों के लिए कितने कष्टमय होते हैं ,,,आपकी रचना उन्ही पहलुओं पर प्रकाश  डालती है ,,,सादर बधाई आपको |

Comment by विनय कुमार on June 1, 2015 at 1:13pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी, आप की नज़र रचना पर पड़ जाती है तो दिल को तसल्ली मिल जाती है .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 1, 2015 at 11:44am

अच्छी प्रस्तुति हुई है . सादर .

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