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अटल नियम है सृष्टि की, देखें आंखे खोल ।
प्राणी प्राणी एक है, आदमी पिटे ढोल ।।

इंसानी संबंध में, अब आ रही दरार ।
साखा अपने मूल से, करते जो तकरार ।।

खग-मृग पक्षी पेड़ के, होते अपने वंश ।
तोड़ रहे परिवार को, इंशा देते दंश ।।

कई जाति अरू वर्ण के, फूल खिले है बाग ।
मिलकर सब पैदा करे, इक नवीन अनुराग ।।

वजूद बगिया के बचे, हो यदि नाना फूल ।
सब अपने में खास है, सबको सभी कबूल ।।

पत्ते छोड़े पेड़ जो, हो जाते हैं खाक ।
उग आतें है ठूठ में, नवीन पर्ण सजात ।।

आम बौराय आम में, नीम बौराय नीम ।
आम नीम के मेल का, दिखे न कोई थीम ।।

आम नीम तो भिन्न है, नाम पेड़ है एक ।
पृथ्क-पृथ्क होते हुये, शत्रुता नही देख ।।
...................................
मौलिक अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 28, 2015 at 5:50pm

आदरणीय रमेश चौहानजी, प्रस्तुति के शिल्प और व्याकरण दोनों पर काम बाकी है.

आपसे बेहतर की उम्मीद हुआ करती है.

शुभेच्छाएँ.

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on April 28, 2015 at 12:25pm

सुन्दर सन्देश युक्त दोहे !

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 27, 2015 at 6:38pm
बहुत अच्छे बोलते दोहे हैं , बधाई, आदरणीय रमेश चौहान जी ,
Comment by narendrasinh chauhan on April 27, 2015 at 5:58pm

बहोत सुंदर दोहे


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 27, 2015 at 3:20pm
आदरणीय रमेश चौहान जी सुंदर दोहावली हुई है हार्दिक बधाई। कुछ शब्दों की अक्षरी एक बार अवश्य देख लें।
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 27, 2015 at 11:57am

सटीक और सुंदर दोहे रचे, आदरणीय रमेश जी. हार्दिक बधाई स्वीकारें

कृपया ध्यान दे...

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