For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

"बापू, हमारे साथ शहर क्यों नहीं चलते ?"
"शहर जा बसेंगे तो खेती कौन करेगा ?"  
"क्या रखा है खेती में ? कभी सूखा फसल को मार जाता है तो कभी बेमौसम बरसात।"
"तुम्हें कैसे समझाऊँ बेटा।"
"खुल कर बताओ बापू, दिल पर कोई बोझ है क्या ?"
"ये अन्नदाता की उपाधि का बोझ है बेटा, तुम नहीं समझोगे ।"      
-------------------------------------------------------------------
(मौलिक एवँ अप्रकाशित)

Views: 840

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 17, 2017 at 10:25pm

"ये अन्नदाता की उपाधि का बोझ है बेटा, तुम नहीं समझोगे ।"      गज़ब आदरणीय सर | एक शशक्त कथा पढने को मिली साधुवाद सर |


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on July 20, 2015 at 10:56pm

टिप्पणियों पर धन्यवाद देने में हुई देरी के लिए क्षमा मांगते हुए रचना को मान बख्शने हेतु दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ आ० राजेश कुमारी जी, आ० केवल प्रसाद जी, आ० महिमा श्री जी, जीतेन्द्र पस्तरिया जी, आ० डॉ विजय शंकर जी, भाई मिथिलेश वामनकर  जी, आ० कान्ता रॉय जी, आ० विजय निकोर जी, आ० पंकज जोशी जी, आ० अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी, आ० डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी,  आ० गिरिराज भंडारी जी, आ० सौरभ पाण्डेय भाई जी, भाई जान गोरखपुरी जी, आ० मोहन सेठी जी,  आ० श्री सुनील जी। 

Comment by kanta roy on May 24, 2015 at 9:56pm
अन्नदाता की उपाधि का बोझ अब कोई नहीं उठाना चाहता है सर जी ..... आपने अपनी कथा के माध्यम से अन्नदाता का जो गरिमा कायम किये है वो सराहनीय है । इस तरह की सार्थक कथा हमारे कृषि प्रधान देश में किसान की गरिमा वापस लाने मे सहायक होगी । इस कथा को इतना सशक्त कि एक बार स्वंय को किसान होने पर अभिमान हो जाये .... यह सिर्फ आप ही कर सकते है । नमन श्री पूज्यनीय योगराज प्रभाकर सर जी
Comment by vijay nikore on April 30, 2015 at 10:49am

एक अत्यंत सशक्त लघु कथा... संदेश बींधने में सफ़ल हो रहा है। हार्दिक बधाई

Comment by Pankaj Joshi on April 29, 2015 at 1:09pm

वाह सर , यह अन्नदाता की उपाधि का बोझ है ,सुंदर 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on April 23, 2015 at 1:53pm

आदरणीय योगराज भाईजी

एक उद्योगपति को अपनी फैक्ट्री से निकले उत्पाद को देखकर जितनी खुशी होती है उससे कहीं ज़्यादा खुशी एक किसान को अपनी   भूमि से अनाज उपजाकर होती है क्योंकि यह उसके  दिन रात की मेहनत का प्रतिफल होता है। भूमि से  वह माँ की तरह प्यार करता हैं इसलिए खुद भी  मेहनत करता है और हर साल फसल लेने को अपना कर्त्तव्य और  माँ की सेवा  मानता है।  जहाँ सेवा भाव हो वहाँ लाभ हानि का ध्यान कौन रखता है, और इसी भाव के कारण ही वह अन्नदाता की उपाधि से विभूषित है। यह भाव आजकल के बच्चों में कहाँ। 

हार्दिक बधाई इस लघु कथा की । 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 23, 2015 at 1:19pm

आ० अनुज

'अन्नदाता की उपाधि " में कितना संस्कार और दर्द भरा है यह वास्तव में शहर के लोग नहीं समझ सकते .पहले तो इतने साधन भी नहीं थे . हमने उन्हें  हल से खेत् जोतते , सरावन चलाते , बालों से गेंहू मांडते  और ओसाते देखा है , कितना लहू जलाने और पसीना बहाने के बाद प्रकृति के अनुकूल रहने पर अनाज के दर्शन होते थे . तब किसान 'अन्नदाता'  कहलाता था. बहुत ही संवेदना से भरी कथा . अनुज आप इसके लिया बधाई के पात्र है .सादर .   


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 22, 2015 at 4:05pm

तुम नहीं समझोगे  के अंदर इतना कुछ है समझने के लिये कि सच मे लगता है हम नहीं समझ पायेंगे ॥ लाजवाब लघुकथा कही , आदरणीय आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 22, 2015 at 9:26am

लघुकथाओं के मर्मज्ञ एवं अत्यंत संवेदनशील लघुकथाओं के लेखक की एक अत्यंत स्तरीय प्रस्तुति ! एक ही साधे सब सधै.. की कहावत को चरितार्थ करती यह लघुकथा जहाँ देश के कृषक वर्ग की विवशताओं को प्रस्तुत करती है, वहीं दायित्व निर्वहन के जज़्बे को सामने लाती है. प्रकृति किसी के कन्धों पर दायित्व निर्वहन का ’बोझ’  --यदि यह कोई बोझ है तो--  यों ही नहीं दे देती. यह एक ऐसा संस्कार है जिसे निभाने वाला प्रकृति द्वारा चयनित होता है. हमारे समाज और व्यवस्था की घनौनी विसंगतियाँ ही सभी विडंबनाओं का मूल हैं. अतः प्रकृति के निर्णय पर प्रश्न न उठे.

आदरणीय योगराज भाईसाहब, इस लघुकथा के हार्दिक शुभकामनाएँ

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 22, 2015 at 9:03am

सुन्दर लघुकथा पर बधाई आदरणीय!

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"आदरणीय जी सादर प्रणाम -  अद्भुत सृजन - हृदय तटों को छूती गहन भावों की अभिव्यक्ति ने अहसासों की…"
6 hours ago
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"प्रिय अशोक कुमार जी,रचना को मान देने के लिए हार्दिक आभार। -- विजय"
yesterday
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"नमस्ते, सौरभ जी। आपने सही कहा.. मेरा यहाँ आना कठिन हो गया था।       …"
yesterday
vijay nikore commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"प्रिय सौरभ भाई, नमस्ते।आपका यह नवगीत अनोल्हा है। कई बार पढ़ा, निहित भावना को मन में गहरे उतारा।…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post आदमी क्या आदमी को जानता है -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई रवि जी सादर अभिवादन। गजल पर आपकी उपस्थिति का संज्ञान देर से लेने के लिए क्षमा चाहता.हूँ।…"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय अशोक भाई, आपके प्रस्तुत प्रयास से मन मुग्ध है. मैं प्रति शे’र अपनी बात रखता…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना पर आपकी पाठकीय प्रतिक्रिया सुखद है, आदरणीय चेतन प्रकाश जी.  आपका हार्दिक धन्यवाद "
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय अशोक भाईजी "
Friday
Ashok Kumar Raktale posted blog posts
Friday
Chetan Prakash commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"नव वर्ष  की संक्रांति की घड़ी में वर्तमान की संवेदनहीनता और  सोच की जड़ता पर प्रहार करता…"
Friday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service