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वे झूठ के दाने बोते हैं
वे झूठ की खेती करते हैं 
जब झूठ की फसलें पकती हैं 
वे सच-मुच में खुश होते हैं 
फिर झूठ-मूठ ही मिल-जुलकर 
हर आने-जाने वाले को 
खाने की दावत देते हैं...

वहां झूठ के लंगर लगते हैं 
वहां झूठ के दोना-पत्तल में 
भर-भर के परोसी जाती हैं 
झूठ-मूठ की पूरी-सब्जी 
झूठ-मूठ के माल-पूवे....

इस झूठ के काले धंधे में 
कई सेवक मोटे- तगड़े से 
लट्ठ- हथियारों से लैस हुए 
जब कहते सबसे लो डकार 
और करो हमारी जय-जयकार 
तो होड़ मचाते आमंत्रित 
दुबले-पतले-मरियल सारे 
मिलकर करते जय-जयकार 
बने रहें हमारे सरकार...!

क्या ऐसा भी दिन आएगा 
जब भेद खुलेगा झूठों का 
जब झूठे धिक्कारे जायेंगे 
जब झूठे सच में भागेंगे...???

(मौलिक अप्रकाशित) 

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Comment by Samar kabeer on April 18, 2015 at 10:43am
जनाब अनवर सुहैल जी,आदाब,सुंदर प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें |
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 18, 2015 at 9:05am

बहुत सुंदर प्रस्तुति, आदरणीय अनवर साहब.

Comment by वीनस केसरी on April 18, 2015 at 3:23am

शानदार रचना है

हार्दिक बधाई ...

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 18, 2015 at 3:12am
झूठ के बारे में इतनी सच्ची बात। बहुत खूब , बधाई , आदरणीय अनवर सुहैल जी , साथ में एक उम्मीद ( कल्पना) भी है। वह भी अच्छी है। सादर ।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 17, 2015 at 10:01pm

बेहतरीन रचना पर बधाई आदरणीय!

Comment by सूबे सिंह सुजान on April 17, 2015 at 9:22pm

अनवर जी,   झूठ की खेती अच्छे मानकों के साथ,उत्तम रचना कही है।   बधाई

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