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ग़ज़ल : वक़्त कसाई के हाथों मैं इतनी बार कटा हूँ

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२

 

वक़्त कसाई के हाथों मैं इतनी बार कटा हूँ

जाने कितने टुकड़ों में किस किस के साथ गया हूँ

 

हल्के आघातों से भी मैं टूट बिखर जाता हूँ

इतनी बार हुआ हुँ ठंडा इतनी बार तपा हूँ

 

जाने क्या आकर्षण, क्या जादू होता है इनमें

झूठे वादों की कीमत पर मैं हर बार बिका हूँ

 

अब दोनों में कोई अन्तर समझ नहीं आता है

सुख में दुख में आँसू बनकर इतनी बार बहा हूँ

 

मुझमें ही शैतान कहीं है और कहीं है इन्साँ

माने या मत माने दुनिया मैं ही कहीं ख़ुदा हूँ

--------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 805

Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 16, 2015 at 10:30am
बहुत बहुत धन्यवाद आ. राजेश कुमारी जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 16, 2015 at 10:29am
बहुत बहुत शुक्रिया महर्षि जी
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 15, 2015 at 9:37pm

धर्मेन्द्र जी

अच्छी गजल है . मुझे आपका आख़िरी शेर भी बहुत सोना लगा .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 15, 2015 at 9:34am

हल्के आघातों से भी मैं टूट बिखर जाता हूँ

इतनी बार हुआ हुँ ठंडा इतनी बार तपा हूँ   -- लाजवाब ,इस  शे र के लिये और गज़ल के लिये आपकोअ हार्दिक बधाई ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 14, 2015 at 9:18pm

आदरणीय धर्मेन्द्र जी बेहतरीन अशआर से सजी उम्दा ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई....

ये अशआर बहुत बेहतरीन हुए है-

हल्के आघातों से भी मैं टूट बिखर जाता हूँ

इतनी बार हुआ हुँ ठंडा इतनी बार तपा हूँ

 

जाने क्या आकर्षण, क्या जादू होता है इनमें

झूठे वादों की कीमत पर मैं हर बार बिका हूँ

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on March 14, 2015 at 4:20pm

वक़्त कसाई के हाथों मैं इतनी बार कटा हूँ

जाने कितने टुकड़ों में किस किस के साथ गया हूँ

धर्मेन्द्र जी बहुत खूब--बधाई --भ्रमर ५

Comment by khursheed khairadi on March 14, 2015 at 9:45am

हल्के आघातों से भी मैं टूट बिखर जाता हूँ

इतनी बार हुआ हुँ ठंडा इतनी बार तपा हूँ

 

जाने क्या आकर्षण, क्या जादू होता है इनमें

झूठे वादों की कीमत पर मैं हर बार बिका हूँ

 आदरणीय धर्मेंदर जी ,सभी अशआर बेहद पसंद  आये ,आपको हार्दिक बधाई |सादर अभिनन्दन |

Comment by Hari Prakash Dubey on March 13, 2015 at 5:45pm

आदरणीय धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी बहुत सुन्दर ,

वक़्त कसाई के हाथों मैं इतनी बार कटा हूँ

जाने कितने टुकड़ों में किस किस के साथ गया हूँ...वाह 

जाने क्या आकर्षण, क्या जादू होता है इनमें

झूठे वादों की कीमत पर मैं हर बार बिका हूँ..........वाह , बधाई आपको इस रचना पर ! सादर"

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 13, 2015 at 7:47am

वाह क्या बात है आदरणीय धर्मेन्द्र जी सारे अश'आर लाजवाब हैें

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 13, 2015 at 5:33am

वक़्त कसाई के हाथों मैं इतनी बार कटा हूँ .....भाव सुंदर लगे बधाई 

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