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बह्र : २२ २२ २२ २

शास्त्र पढ़े विज्ञान पढ़ा
कब तुमने इंसान पढ़ा

बस उसका गुणगान पढ़ा
कब तुमने भगवान पढ़ा

गीता पढ़ी कुरान पढ़ा
कब तुमने ईमान पढ़ा

कब संतान पढ़ा तुमने
बस झूठा सम्मान पढ़ा

जिनके थे विश्वास अलग
उन सबको शैतान पढ़ा

जिसने सच बोला तुमसे
उसको ही हैवान पढ़ा

सूरज निगला जिस जिस ने
उस उस को हनुमान पढ़ा
---------
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by शिज्जु "शकूर" on March 11, 2015 at 8:24pm

आपकी ग़ज़लें हमेशा वर्तमान हालात का अक्स हुआ करती हैं, छोटी बह्र में एक शानदार ग़ज़ल कही है आपने बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Shyam Mathpal on March 11, 2015 at 7:34pm

Aadarniya dharmendra Ji,

Bahut sundar gazal ki liye dil se badhai. Kuch hat kar rachna lagi. Sabdon ko bahut acchha upyog kiya hai.

Aabhar

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 11, 2015 at 7:19pm

आ० धर्मेन्द्र जी

गीता पढ़ी कुरान पढ़ा-------बह्र से बाहर लगता है  i  --- गीता और कुरान पढा   ----हो सकता है  i कृपया देखले i बाकी गजल बहुत अच्छी  है i सादर i

Comment by maharshi tripathi on March 11, 2015 at 5:24pm

आहूत सुन्दर रचना ,,एक एक लाइन भावपूर्ण है ,,आपको बधाई आ.धर्मेन्द्र जी |

कृपया ध्यान दे...

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