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सीप में बंद मोती .....

सीप में बंद मोती .....

दूर उस क्षितिज पर
रोज इक सुबह होती है
रोज सागर की सूरज से
जीवन के आदि और अंत की बात होती है
जब थक जाता है सूरज
तो सागर के सीने पर
अपना सर रख देता है
और रख देता है
अपने दिन भर के
सफ़र की थकान को
अपने हर सांसारिक
अरमान को
बिखेर देता है
अपनी सुनहरी किरणों की
अद्वितीय छटा को
सागर की शांत लहरों पर
फिर अपने अस्तित्व को
धीरे-धीरे निशा में बदलती
सुरमई सांझ के आलिंगन में
विलीन कर क्षितिज में ओझल हो जाता है
जीवन शांत हो जाता है
क्या उदय सत्य है
या अस्त सत्य है
ये आभास है
या सत्य का विरोधाभास है
न ये तृप्ति है न ये प्यास है
क्या है आखिर
इक अंकुर में जीवन प्रभात है
तो इक सांझ में निराशा का वास है
सागर के गर्भ में जीवित
असंख्य सीपियों की तरह
जीवन के गर्भ में भी असंख्य प्रश्न
अपने उत्तर के लिए भटकते हैं
और उत्तर बस
सीप में बंद मोती की तरह
उस नूर की मुट्ठी में बंद हैं
जिसके हम सब बन्दे कहलाते हैं
जिसे हम सब
ईश्वर,अल्लाह,ईसा मसीह,वाहे गुरु कहते हैं

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 755

Comment

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Comment by Sushil Sarna on February 26, 2015 at 7:24pm

आदरणीय गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी आपके द्वारा  रचना की चयनित पंक्तियों पर आपकी स्नेहाशीष से लेखन सफल हुआ ,आपका हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on February 26, 2015 at 7:22pm

आदरणीय ,निर्मल नदीम जी रचना पर आपकी दाद की पुष्प वर्षा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on February 26, 2015 at 7:20pm

आदरणीय कृष्णा मिश्रा 'जान 'गोरखपुरी जी रचना पर आपकी स्नेहमयी प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by maharshi tripathi on February 26, 2015 at 4:57pm

वाह !!क्या अनमोल संदेश दिया है आपने आ.सुशील जी ,,,,,आपको इस सुन्दर रचना पर हार्दिक बधाई |

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 26, 2015 at 4:22pm

क्या उदय सत्य है 
या अस्त सत्य है 
ये आभास है 
या सत्य का विरोधाभास है 
न ये तृप्ति है न ये प्यास है 
क्या है आखिर 

अपने उत्तर के लिए भटकते हैं 
और उत्तर बस 
सीप में बंद मोती की तरह 
उस नूर की मुट्ठी में बंद हैं 
जिसके हम सब बन्दे कहलाते हैं 
जिसे हम सब 
ईश्वर,अल्लाह,ईसा मसीह,वाहे गुरु कहते हैं - सार गर्भित रचना के ये पंक्तियाँ ही प्रश्न और जिज्ञासा शांत कर रही है | बहुत खूब 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 26, 2015 at 3:40pm

आ 0 सरना जी

बहुत डूबकर लिखा आपने निम्न पंक्तियों पर हृदय निसार है  i सादर i

और उत्तर बस
सीप में बंद मोती की तरह
उस नूर की मुट्ठी में बंद हैं
जिसके हम सब बन्दे कहलाते हैं

Comment by Nirmal Nadeem on February 26, 2015 at 2:55pm

atisundar kavita hai sir.

bahut achchhi hai. dili daad hazir hai.

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 26, 2015 at 1:55pm

क्या उदय सत्य है
या अस्त सत्य है
ये आभास है
या सत्य का विरोधाभास है
न ये तृप्ति है न ये प्यास है
क्या है आखिर
इक अंकुर में जीवन प्रभात है??

क्या बात है...बहुत खूब..आदरणीय सुशील जी बधाई स्वीकारें!

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