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आशिक़ों की आँखो का रुख़ बदलने लगता है
जब किसी जवानी का चाँद ढलने लगता है

इब्तिदा ख़ुशामद से इल्तिजा से होती है
और फिर ये होता है,नाम चलने लगता है

सब्र की नसीहत भी काम कुछ नहीं करती
जब किसी की चाहत में दिल मचलने लगता है

हमने दिल को ले जाकर उस जगह पे रख्खा है
जिस जगह पे ख़्वाहिश का दम निकलने लगता है

जब भी मैं अंधेरों से हमकलाम होता हूँ
इक चराग़ सा मेरे दिल में जलने लगता है

आख़िरत के बारे में जब भी सोचता हूँ मैं
रूह कांप जाती है दिल दहलने लगता है

किस लिये हो अफ़सुर्दा ,क्यूँ "समर" परीशाँ हो
रात जब गुज़रती है दिन निकलने लगता है

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकशित

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Comment by Samar kabeer on February 18, 2015 at 10:05pm
जनाब परी एम श्लोक जी,आदाब,हौसला अफ़ज़ाई के लिये बहुत बहुत शुक्रिया |
Comment by Samar kabeer on February 18, 2015 at 10:01pm
जनाब लक्ष्मण धामी जी,आदाब,बहुत बहुत शुक्रिया |
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 18, 2015 at 12:07pm

आ0 भाई समर जी, खूबसूरत ग़ज़ल हुई है , हार्दिक बधाइयाँ कुबूलें l

Comment by Pari M Shlok on February 18, 2015 at 10:13am
वाह वाह क्या बात ...
किस लिये हो अफ़सुर्दा ,क्यूँ "समर" परीशाँ हो
रात जब गुज़रती है दिन निकलने लगता है

सुन्दर सन्देश है ग़ज़ल के आखिरी अशआर में ......

बाकी सभी अशआर उम्दा ..बधाई आपको
Comment by Samar kabeer on February 17, 2015 at 10:31pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी ,आदाब, हौसला अफ़ज़ाई के लिये बहुत बहुत शुक्रिया |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 17, 2015 at 8:26pm

आदरणीय समर भाई , खूबसूरत ग़ज़ल हुई है , हार्दिक बधाइयाँ कुबूल करें ॥

सब्र की नसीहत भी काम कुछ नहीं करती
जब किसी की चाहत में दिल मचलने लगता है

किस लिये हो अफ़सुर्दा ,क्यूँ "समर" परीशाँ हो
रात जब गुज़रती है दिन निकलने लगता है
इन दो अशआर के लिये बहुत बहुत बधाइयाँ , आदरणीय ॥

Comment by Samar kabeer on February 17, 2015 at 10:27am
जनाब मिथिलेश वामनकर जी ,आदाब,आप ख़ुद भी अच्छे फ़नकार हैं इस्लिये दूसरों का दर्द फ़ौरन समझ लेते
हैं,तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on February 17, 2015 at 10:21am
जनाब दिनेश कुमार जी,आदाब,
"दिल से जो बात निकलती है असर रखती है
पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है"
ग़ज़ल आप को पसंद आई महनत वसूल हुई,तहे दिल से शुक्रिया |
Comment by दिनेश कुमार on February 17, 2015 at 6:09am
आदरणीय समर कबीर सर जी, बेहतरीन ग़ज़ल हुई है। हर एक शेर गुनगुनाने के साथ दिल से खुद ब खुद वाह वाह निकलती है। सभी अशआर बहुत बढ़िया हैं। इस लय में वाकई कोई जादू है जो अपनी तरफ आकर्षित करता है। अच्छे शब्द और अच्छी लय ने मिलकर मन मोह लिया है। वाह वाह

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 17, 2015 at 1:52am

आदरणीय समर कबीर जी, वाह वाह वाह, क्या लय है  ग़ज़ल की ... एक एक अशआर मोती जैसा... बस गुनगुनाते हुए आनंद ले रहा हूँ..... बह्र को क्या खूब निभाया है... फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन.... वाह वाह वाह ... शेर दर शेर दिल से दाद कुबूल फरमाए.

सब्र की नसीहत भी काम कुछ नहीं करती
जब किसी की चाहत में दिल मचलने लगता है

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