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न मैखाना शहर में है

बता दो याद अब उनकी मिटायें हम कहॉं जाकर

लिखा जो प्‍यार के किस्‍से सुनायें हम कहॉं जाकर

बजाकर जो कभी पायल जिगर के पास आती थी
नज़र उसको लगी मेरी बतायें हम कहाँ जाकर

न मैखाना शहर में है न उसका घर पता मुझको
जरा कोई बताये दिल लगायें हम कहाँ जाकर

न पीया जाम क्‍यों मैने अगर पूछो न तुम मुझसे
नजर बोतल में आती तुम दिखायें हम कहाँ जाकर

मिला कर जाम में पानी कभी क्‍यूँ मै नहीं पीता
शहर में अश्‍क बहता है मिलायें हम कहॉं जाकर

मौलिक एवं अप्रकाशित अखंड गहमरी

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Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on February 7, 2015 at 10:13pm

आदरणीय अखंड गहमरी जी, इस शानदार ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई, सादर।

बजाकर जो कभी पायल जिगर के पास आती थी

नज़र उसको लगी मेरी बतायें हम कहाँ जाकर....क्या बात है ,सुन्दर 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 7, 2015 at 10:03am

बेहतरीन गजल रचना  के लिए बधाई श्री अखंड गहमरी जी 


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Comment by गिरिराज भंडारी on February 7, 2015 at 9:50am

आदरणीय अखंड भाई , अच्छी गज़ल हुई है , आपको हार्दिक बधाइयाँ । आ. मिथिलेश भाई की सलाह पर गौर की जियेगा ।

Comment by Akhand Gahmari on February 6, 2015 at 10:52am

आदरणीय मिथिलेस वामनकर जी आपका सुझाव एवं मार्गदर्शन के लिये आपको नमन

आपके मार्गदर्शन के अनुसार मैने गजल में कुछ  परिवर्तन किया जिसे देखे

बता दो याद अब उनकी मिटायें हम कहॉं जाकर लिखा जो प्‍यार के किस्‍से सुनायें हम कहॉं जाकर

बजाकर जो कभी पायल जिगर के पास आती थी
नज़र उसको लगी मेरी बतायें हम कहाँ जाकर

न मैखाना शहर में है न उसका घर पता मुझको
जरा कोई बताये दिल लगायें हम कहाँ जाकर

न पीया जाम क्‍यों मैने अगर पूछो न तुम मुझसे
नजर बोतल में आती तुम दिखायें हम कहाँ जाकर

मिला कर जाम में पानी कभी क्‍यूँ मै नहीं पीता
शहर में अश्‍क बहता है मिलायें हम कहॉं जाकर
अखंड गहमरी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 6, 2015 at 10:11am

आदरणीय अखंड जी सुन्दर ग़ज़ल हुई है बह्र-ए-हज़ज को खूब निभाया है दिल से दाद कुबूल फरमाएं 

टंकण त्रुटी- मतले और आखिरी शेर में कहॉं को कहाँ और चौथे शेर में बोलत को बोतल कर ले. एक शेर पर निवेदन करना चाहूँगा -

न पीया जाम क्‍यों मैने अगर पूछो न तुम मुझसे
नजर बोलत में आती तुम बतायें हम कहाँ जाकर

इस शेर के मिसरा-ए-उला में बह्र का दबाव महसूस हो रहा है इसे अगर उचित लगे तो कुछ यूं भी कहा जा सकता है-

न पीया जाम क्‍यों मैने कोई पूछो न अब मुझसे
नजर बोतल  में आती वो बतायें हम कहाँ जाकर

इसी तरह एक और अशआर पर अपने विचार साझा करना चाहूँगा यदि आपको उचित लगे तो निवेदानार्थ -

न मैखाना शहर में है न उसका घर पता मुझको
जरा कोई बताये दिल जलायें हम कहाँ जाकर

इसमें मिसरा-ए-उला में  न उसका घर पता मुझको --में पता शब्द से दो अर्थ  ध्वनित हो रहे है एक जानकारी, और दूसरा एड्रेस. यदि इसे वाक्य में बदले तो इसे कहेंगे - मुझे उसके घर की जानकारी नहीं है या उसका घर कहाँ है मुझे नहीं मालूम. यदि यहीं ध्वन्यार्थ है तो इसे यूं कह सकते है- 

न मैखाना शहर में है, न उसका घर मुझे मालूम 
जरा कोई बताये, दिल जलायें हम कहाँ जाकर

Comment by Shyam Narain Verma on February 6, 2015 at 9:56am

बेहद खूबसूरत ग़ज़ल है दिली दाद कुबूल फरमायें

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 6, 2015 at 12:58am
सुन्दर, आदरणीय अखंड गहमरी जी, बधाई, सादर।
Comment by ram shiromani pathak on February 5, 2015 at 7:27pm
लूट लिया साहब आपने।।जय हो

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