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वो जैसे नचा रहा है, मैं वैसे नाच रहा हूँ

समय

साक्षी है

अतीत का

वर्तमान का

मैं सिर्फ इसके

साक्ष्य को

दोहरा रहा हूँ

इसके लिखे गीतों को

गुनगुना रहा हूँ !

 

समय

ने बाँध दिया

जीवन और

मृत्यु की

डोर से मुझको

और मैं

पतंग की तरह

हवाओं में,

लहरा रहा हूँ !

 

धागा

ये प्रेम का

बड़ा नाजुक है

टूट ना जाये कहीं

ये सोच के 

घबरा रहा हूँ 

वो जैसे नचा रहा है

मैं वैसे नाच रहा हूँ !!

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on February 3, 2015 at 9:09pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर, रचना पर आपकी उपस्तिथि एवम् उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक आभार ! सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 3, 2015 at 3:09pm

आदरणीय हरिप्रकाश दुबे जी, इस सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई ...

समय \साक्षी है\ अतीत का \वर्तमान का

मैं सिर्फ इसके\ साक्ष्य को \दोहरा रहा हूँ

इसके लिखे गीतों को\गुनगुना रहा हूँ !............. बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ 

 

समय \ने बाँध दिया \जीवन और \

मृत्यु की \डोर से मुझको\ और मैं

पतंग की तरह \हवाओं में, \लहरा रहा हूँ !...........वाह वाह 

इसके बाद की पंक्तियों में कहीं कुछ कमी सी लग रही है जैसे 

 

धागा\ ये प्रेम का \बड़ा नाजुक है

टूट ना जाये कहीं \ ....................और इसके बाद की पंक्तियों .........वो जैसे नचा रहा है\मैं वैसे नाच रहा हूँ !!........... इन पंक्तियों के बीच एक गेप का अहसास हो रहा है. लग रहा है जैसे कहन में कुछ छूट रहा है इसलिए इसे मैं कुछ ऐसे पढ़ रहा हूँ-

धागा\ ये प्रेम का \बड़ा नाजुक है

टूट ना जाये कहीं \ ये सोच के घबरा रहा हूँ 

वो जैसे नचा रहा है\मैं वैसे नाच रहा हूँ !!

Comment by Anurag Goel on February 3, 2015 at 2:18pm

कम शब्दों में बड़ी बात, बहुत खूब


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 3, 2015 at 11:10am

आदरणीय हरिप्रकाश दुबे जी बहुत ही खुबसूरत रचना प्रस्तुत हुई है, इस बार जो "ओ बी ओ लाइव महाउत्सव" अंक-52 होने वाला है उसका विषय भी यही है, बधाई महोदय.

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 3, 2015 at 9:56am
समय को , उसके ही रूप में , कुछ नये शब्दों में प्रस्तुत करती एक सुन्दर रचना. बधाई , आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी , सादर।

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