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सांस है मुसाफिर......(एक रचना )

सांस है मुसाफिर.......(एक रचना )

सांस है मुसाफिर इसको  राह में ठहर जाना है
जिस्म के  पैराहन को  जल के बिखर जाना है

दुनिया को मयखाना  समझ नशे में ज़िंदा रहे
होश आया तो समझे कि ख़ुदा  के घर जाना है

याद किसकी सो  गयी  बन के अश्क आँख में
धड़कनें समझी न ये  जिस्म  को मर जाना है

ज़िंदगी समझे जिसे  दरहक़ीक़त वो ख़्वाब थी
सहर होते ही जिसे बस रेत सा बिखर जाना है

कतरा-कतरा  प्यार  में जिस के हम मरते रहे
वो राह को  रोके खड़े हैं  हमको जिधर जाना है

दर्द ख्वाबों  के  हमारे  कोई भला क्या जानेगा
साथ  हस्ती  के इन्हें भी ख़ाक में मर जाना है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on January 23, 2015 at 7:29pm

आदरणीय  somesh kumar   जी रचना पर आपकी मधुर  प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on January 23, 2015 at 7:28pm

आदरणीय  Hari Prakash Dubey   जी रचना पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 23, 2015 at 11:25am

सांस है मुसाफिर इसको  राह में ठहर जाना है
जिस्म के  पैराहन को  जल के बिखर जाना है

दुनिया को मयखाना  समझ नशे में ज़िंदा रहे
होश आया तो समझे कि ख़ुदा  के घर जाना है    -----सरना जी i बहुत उम्दा i  बधाई हो i

Comment by Dr. Vijai Shanker on January 23, 2015 at 10:07am
आदरणीय सुशील सरना जी, " सांस है मुसाफिर" रचना पसंद आई, बधाई , सादर।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 22, 2015 at 10:22pm

आदरणीय सुशील सरना जी, आपकी रचना पसंद आयी, बहुत बहुत बधाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 22, 2015 at 7:25pm

आदरणीय सुशील सरना जी  इस सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई ...

Comment by somesh kumar on January 22, 2015 at 7:24pm

दुनिया को मयखाना  समझ नशे में ज़िंदा रहे 
होश आया तो समझे कि ख़ुदा  के घर जाना है|

बहुत गहरा जीवन -दर्शन है इन पंक्तियों में |

गज़ल भी बहुत कुछ कह रही है |सुंदर !अभिवादन इस रचना पर आ.|

Comment by Hari Prakash Dubey on January 22, 2015 at 7:19pm

आदरणीय सुशील सरना जी  इस सुन्दर रचना पर हार्दिक बधाई आपको ....

दुनिया को मयखाना  समझ नशे में ज़िंदा रहे

होश आया तो समझे कि ख़ुदा  के घर जाना है..........ये पंक्तियाँ तो गज़ब ढा रही हैं ..सादर !

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