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डरी आँखों ने देखा वो नज़ारा कैसे---(ग़ज़ल 'राज')

१२२२  १२२२  १२२२ २ 

कभी फुर्सत मिले तो सोच हारा कैसे

बिना तैरे मिले किसको किनारा कैसे

 

जहाँ लगती दिलों की भी बराबर कीमत

वहाँ पैसों बिना भी हो गुज़ारा  कैसे

 

जिसे भाने लगे  कबसे रकीबों के घर

भला दिल से कहें उसको हमारा कैसे

 

मुहब्बत की जहाँ रिमझिम फुहारें गिरती  

सुलग उट्ठा वहाँ अदना शरारा कैसे

 

जहाँ मासूम लाशें हर तरफ फैली थी

डरी आँखों ने देखा वो नज़ारा  कैसे

 

 

नहीं मिलती सदाक़त की जहाँ पर लाठी

कोई फिर दे वहाँ किसको सहारा कैसे

 

लुटेरों का फ़लक के हश्र भी देखा क्या?

हवाओं  ने उन्हें नीचे उतारा कैसे

 

खुदा का दर कभी जिसके लिए बेजां था   

उसी काफिर ने अब उसको पुकारा कैसे

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 23, 2015 at 10:20pm

प्रिय प्रतिभा त्रिपाठी जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई आपकी सराहना मेरी लेखन के प्रति आश्वस्ति का तथा उत्साह का कारण बनी तहे दिल से आभार आपका 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 23, 2015 at 9:53pm

राहुल डांगी जी ,बहुत बहुत शुक्रिया आपका |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 23, 2015 at 9:52pm

आ० डॉ० विजय शंकर जी आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सफल हुआ तहे दिल से आभार आपका | 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 23, 2015 at 9:51pm

आ० गणेश बागी जी ,ग़ज़ल पर आपकी सराहना पाकर उत्साहित हूँ आपका सुझाव स्वागत योग्य है |तहे दिल से आपका बहुत बहुत आभार |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 23, 2015 at 9:49pm

आ० गिरिराज भंडारी जी ,आप जैसे ग़ज़लकार से दाद पाना बहुत उत्साह वर्धक है आपका तहे दिल से बहुत- बहुत आभार. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 23, 2015 at 9:48pm

हरि प्रकाश दूबे जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई तहे दिल से आभार आपका .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 23, 2015 at 9:47pm

मिथिलेश वामनकर जी ,ग़ज़ल पर आपकी दाद पाकर उत्साहित हूँ मेरा लिखना सफल हुआ दिल से आभार आपका 

Comment by Rahul Dangi Panchal on January 23, 2015 at 12:52pm
आदरणीय सुन्दर गजल
Comment by Dr. Vijai Shanker on January 23, 2015 at 2:35am
जिसे भाने लगे कबसे रकीबों के घर
भला दिल से कहें उसको हमारा कैसे
सुन्दर ग़ज़ल, आदरणीय राजेश कुमारी जी , बधाई, सादर।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 22, 2015 at 11:21pm

//कभी फुर्सत मिले तो सोच हारा कैसे

बिना तैरे मिले किसको तुझको किनारा कैसे// अगर ऐसे कहे तो ....

//सुलग उट्ठा वहाँ अदना शरारा कैसे//  'उट्ठा' पर मैं क्लियर नहीं हो पा रहा.

ग़ज़ल अच्छी लगी आदरणीया राजेश कुमारी जी, बहुत बहुत बधाई.

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