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सिपाही (मत्तगयंद सवैया)


प्राण निछावर को तुम तत्पर,
भारत के प्रिय वीर सिपाही।
दुश्मन को ललकार अड़े तुम
अंदर बाहर छोड़ कुताही ।।
सर्द निशा अरू धूप सहे तुम,
देश अखण्ड़ सवारन चाही ।
मस्तक उन्नत देश किये तब,
मंगल जीवन लोग निभाही ।।
.................................
मौलिक अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 5, 2015 at 12:29am

मत्तगयंद सवैया के अनुसार रचना सही है .. लेकिन भाषा क्या है, भइया.. :-))
एक अच्छी कोशिश के लिए बधाइयाँ.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 4, 2015 at 4:43pm

मत्तगयन्द सवैया पर बढ़िया काम हुआ है आदरणीय रमेश जी, बहुत बहुत बधाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 4, 2015 at 10:28am

बहुत बढ़िया आदरणीय रमेश भैया बहुत बहुत बधाई इस रचना के लिये

Comment by Dr. Vijai Shanker on January 3, 2015 at 11:50pm
बधाई , आदरणीय रमेश कुमार चौहान जी, सादर।
Comment by Hari Prakash Dubey on January 3, 2015 at 8:26pm

आदरणीय रमेश जी  बहुत बढ़िया . बधाई आपको !

Comment by रमेश कुमार चौहान on January 3, 2015 at 7:08pm

आदरणीय श्रीवास्तवजी, वर्माजी, पाठकजी एवं वामनकरजी आप सभी ने इस रचना को मान दिया इसके लिये  सब को हृदय से आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 3, 2015 at 6:04pm

आदरणीय रमेश जी सुन्दर रचना पर हार्दिक बधाई

Comment by ram shiromani pathak on January 3, 2015 at 5:43pm
सुन्दर मत्तगयन्द आदरणीय।।बधाई
Comment by Shyam Narain Verma on January 3, 2015 at 4:55pm

सुन्दर रचना पर हार्दिक बधाई !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 3, 2015 at 4:35pm

सात भगण  और अंत में दो गुरु का अच्छा निर्वाह हुआ है i रमेश जी बधाई i

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