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ग़ज़ल - कल पराया जो लगा था, आज प्यारा हो गया ( गिरिराज भंडारी )

2122     2122     2122     212

अश्क़ ऊपर जब उठा, उठ कर  सितारा हो  गया

जा मिला जब अश्क़ सागर से, वो खारा हो गया

 

चन्द  मुस्कानें  तुम्हारी शक़्ल में  जो पा लिये

आज दिन भर के  लिये अपना ग़ुजारा  हो गया

 

चाहतें जब  इक हुईं , तो  दुश्मनी  भूले  सभी   

कल पराया जो लगा था, आज  प्यारा  हो गया

 

ढूँढ  कर  तनहाइयाँ  हम  यादों  में मश्गूल थे

रू ब रू आये  तो  यादों  का  खसारा हो  गया

 

ख़्वाब में भी देख जो मंज़र, तड़प  जाते थे हम

हर गली , हर चौक में  अब वो नज़ारा हो गया

 

आप  उस बुझते  हुये  से  कोयले को  फूँकिये

एक  दिन  पायेंगे वो  फिर से शरारा हो  गया

 

आँसुओं  को  रात भर  पीते  रहे , मदहोश थे

सुब्ह दम नज़रें  मिलीं , समझो उतारा हो गया

**********************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित ( संशोधित )

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 26, 2014 at 9:08pm

आदरणीय शिज्जु भाई , हौसला अफज़ाई के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 26, 2014 at 9:07pm

आदरणीय राम भाई , उत्साह वर्धन और सराहना के लिये आपका शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 26, 2014 at 9:06pm

आदरणीय वीनस भाई , गज़ल आपनी न्ज़रों से गुज़री तो मन मे संतोष हुआ , आपकी सरहाना के लिये आपका बहुत आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 26, 2014 at 9:05pm

आदरणीय सौरभ भाई , हौसला अफज़ाई का शुकिया ! आदरणीया राजेश जी की सलाह का मुझे ध्यान है , मै ज़रूर सुधार करूंगा ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 26, 2014 at 9:01pm

आदरणीय अनुराग भाई , आपकी सलाहों के लिये आपका आभार , सोच मे शामिल कर लिया हूँ , सही लगने से आवश्यक सुधार कर लूंगा ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 26, 2014 at 8:51pm

आदरणीय गिरिराज सर क्या खूब ग़ज़ल कही
इस शेर के लिये खास दाद कुबूल कीजिये

आप  उस बुझते  हुये  से  कोयले को  फूँकिये

एक  दिन  पायेंगे वो  फिर से शरारा हो  गया

Comment by ram shiromani pathak on December 26, 2014 at 10:08am
वाह वाह क्या कहने आदरणीय ज़ोरदार ग़ज़ल बहुत बहुत बधाई आपको।।सादर
Comment by वीनस केसरी on December 26, 2014 at 4:09am

आप  उस बुझते  हुये  से  कोयले को  फूँकिये

एक  दिन  पायेंगे वो  फिर से शरारा हो  गया

 

वाह जनाब क्या कहने


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 25, 2014 at 11:34pm

वाह ! एक खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद, आदरणीय गिरिराज भण्डारीजी. आदरणीया राजेश जी का सुझाव अनुमन्य है.
सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 25, 2014 at 9:30pm

आ. हरि प्रकाश भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका दिल से आभारी हूँ ।

कृपया ध्यान दे...

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