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उसने सागर से कहा “पानी दो बहुत प्यासा हूँ”

सागर बोला -“रोज पीते हो खाली हो गया हूँ”|

नदिया से कहा “पानी दो बहुत प्यासा हूँ” नदिया ने कहा “आगे जा रही हूँ पसीना बहाने वाले प्यासों के पास;

 पीछे लौटना मेरी नियति नहीं है”|

 कुए से कहा “पानी दो प्यासा हूँ गला सूख रहा है मर जाऊँगा ”

कुँए ने कहा “मैं स्वाभिमानी हूँ  प्यासे के पास नहीं जाता प्यासा मेरे पास आता है”|

पास बहते नाले से कहा "तू ही पिला दे यार" उसने कहा “पहले ही तू मुझे  बहुत गन्दा कर चुका है”|

"कोई मत पिलाओ हरामखोरों पर वो तो पिलाएगी ही रात की मार भूली थोड़े ही होगी ” ...कुछ होश आते ही अधखुली आँखों से इधर-उधर देखता है|

कौने में चूल्हा ठण्ड से कंपकंपा रहा है |बोला  “नहीं पिलाएगी चली गई है, तेरी प्यास से बड़ी तेरे बच्चों की प्यास थी”!!!

नई रानी लालपरी नाच रही है अलमारी में हाथ के इशारे से बुला रही है “अब मैं ही बची हूँ.... चला आ तेरा गम भुला दूँ ”... और वो लडखडाते कदमों से उसकी और चल देता है...

चुल्लूभर पानी लिए पास रखी छोटी कटोरी ठहाका मारकर हँसती है ..... "जा  जा फिर भी अंत में तू मेरे पास ही आएगा" |   

.

(मौखिक एवं अप्रकाशित )   

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Comment by rajesh kumari on December 20, 2014 at 6:04pm

प्रिय मीना पाठक जी ,आपका प्रभूत आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 20, 2014 at 6:03pm

आ० अखिलेश जी ,आपको ये लघु कथा पसंद आई इसका तथ्य रुचा ,मेरा लेखन सार्थक हुआ दिल से आभार आपका सादर 

Comment by Shyam Narain Verma on December 20, 2014 at 5:08pm

बहुत  ही सुन्दर प्रस्तुति  //हार्दिक बधाई आपको 

Comment by Meena Pathak on December 20, 2014 at 4:13pm

सार्थक प्रस्तुति ..बहुत बहुत बधाई 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on December 20, 2014 at 12:09pm

आदरणीया राजेशजी

होश वालों ,  पीने वालों ,बेअकल , कम अकल , ज़्यादा अकल  और स्कूल के बच्चों सभी के लिए शिक्षाप्रद है आपकी यह रचना। 

बच्चों को तो अवश्य बताना चाहिए पानी का महत्व। जल ही जीवन है , जल रहेगा तो कल रहेगा , जैसे अभियान के लिए यह एक विचारणीय सार्थक रचना है । 

हार्दिक बधाई 

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