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पीर पैरों की खड़ा होने नही देती मुझे...............

पीर पैरों की खड़ा होने नही देती मुझे
मेरी देहरी ही बड़ा होने नहीं देती मुझे

फिर वही आँगन की परिधि में बँट गया 
किंतु सीमाएँ मेरी खोने नहीं देती मुझे

उधर पाबंदी ज़माने की हैं हँसनें पे मेरे
इधर दीवारें मेरी रोने नहीं देती मुझे

कर्म के ही हल सदा रखती है कंधें पर नियति 
पर कभी फसलें मेरी , बोने नहीं देती मुझे

रोज़ सहता हूँ पराजय के अनेकों दंश फिर भी
ज़िद ये साँसों की "अजय" मरने नही देती मुझे

अजय कुमार शर्मा
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 561

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 13, 2014 at 7:42pm

आदरणीय अजय जी इस रचना के लिए हार्दिक बधाई ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 12, 2014 at 12:07pm

आदरणीय भाई अजय जी इस सार्थक प्रयास के लिए हार्दिक बधाई ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 11, 2014 at 9:35pm

आदरणीय अजय भावों के लिये बधाई एवं शुभकामनायें

Comment by Meena Pathak on December 11, 2014 at 6:18pm

उधर पाबंदी ज़माने की हैं हँसनें पे मेरे
इधर दीवारें मेरी रोने नहीं देती मुझे.......................बेहद उम्दा 

Comment by saalim sheikh on December 10, 2014 at 10:15pm

खूबसूरत रचना के लिए बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 10, 2014 at 8:23pm

आदरणीय अजय भाई , बहुत  बढ़िया बात कही है आपने । वाह

पीर पैरों की खड़ा होने नही देती मुझे
मेरी देहरी ही बड़ा होने नहीं देती मुझे -     बधाइयाँ ।

आ. योगराज भाई जी की बात से सहमत हूँ , रचना गज़ल होते होते रह गई है ।

Comment by Rahul Dangi Panchal on December 10, 2014 at 6:17pm
बहुत सुन्दर वाह!

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on December 10, 2014 at 10:39am

भाई अजय शर्मा जी, थोड़ी सी मेहनत से इस रचना को ग़ज़ल बनाया जा सकता था। मंच पर ग़ज़ल सम्बन्ध काफी जानकारी उपलब्ध भी है, उसका लाभ उठायें।

कृपया ध्यान दे...

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